श्री रामचरितमानस: अयोध्या काण्ड (Shri Ramcharitmanas: Ayodhya Kand)


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❀ मंगलाचरण - Mangalacharan
❀ श्री राम के राज्याभिषेक की तैयारी - Preparations for making Rama, the Prince
❀ कैकेयी-मन्थरा संवाद - Dialogue of Kaikeyi and Manthara
❀ कैकेयी का कोप भवन में जाना - Kaikeyi's entry into House of Anger
❀ श्री दशरथ-कैकेयी संवाद - Dialogue of Dasharatha and Kaikeyi
❀ श्री राम-कैकेयी संवाद - Dialogue of Sri Rama and Kaikeyi
❀ श्री राम-दशरथ संवाद - Dialogue of Sri Rama and Dasharatha
❀ श्री राम-कौशल्या संवाद - Dialogue of Sri Rama and Kaushalya
❀ श्री सीता-राम संवाद - Dialogue of Sri Rama and Sita
❀ श्री राम-कौशल्या-सीता संवाद - Dialogues of Sri Rama, Sita and Kaushalya
❀ श्री राम-लक्ष्मण संवाद - Dialogue of Sri Rama and Lakshmana
❀ श्री लक्ष्मण-सुमित्रा संवाद - Dialogue of Sri Lakshmana and Sumitra
❀ श्री राम-लक्ष्मण और सीता जी का श्री दशरथ से विदा लेना - Sri Rama, Lakshmana and Sita to take leave of Dasharatha
❀ श्री राम-सीता-लक्ष्मण का वन गमन - Going to Forest of Sri Rama, Lakshmana and Sita
❀ श्री राम का श्रृंगवेरपुर पहुँचना - Arrival of Sri Rama in Sringverpur
❀ श्री लक्ष्मण-निषाद संवाद - Dialogue of Sri Lakshmana and Nishad
❀ श्री राम-सीता से सुमन्त्र जी का संवाद - Dialogue of Sumantra with Sri Rama and Sita
केवट का प्रेम - Love of Kevata
❀ प्रयाग में श्री भरद्वाज से मिलना - Meeting with Sri Bhardwaj in Prayag
❀ वनवासियों का प्रेम - Love of Forest Dwellers
❀ श्री राम-वाल्मीकि संवाद - Dialogue of Sri Rama and Valmiki
❀ श्री राम का चित्रकूट में निवास - Sri Rama's stay in Chitrakoot
❀ सुमन्त्र का अयोध्या लौटना - Sumantra's Ayodhya Return
❀ श्री दशरथ-सुमन्त्र संवाद - Dialogue of Sri Dasharatha and Sumantra
❀ श्री दशरथ जी का प्राण-त्याग - Death of Sri Dasharatha
❀ श्री वशिष्ठ का भरत जी को बुलाने के लिए दूत भेजना - Sending of Messengers to call Bharata back by Sri Vashishtha
❀ श्री भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक - Arrival and Disappointment of Sri Bharata and Shatrughna
❀ श्री भरत-कौसल्या संवाद - Dialogue of Sri Bharata and Kaushalya
❀ श्री वशिष्ठ-भरत संवाद - Dialogue of Sri Vashishtha and Bharata
❀ अयोध्यावासियों सहित श्री भरत-शत्रुघ्न का वनगमन - Bharata and Shatrughna's Going to Forest with residents of Ayodhya
❀ निषाद की भरत जी पर शंका - Doubt of Nishada on Sri Bharata
❀ श्री भरत-निषाद मिलन और संवाद - Meeting and Dialogue of Sri Bharata and Nishada
❀ श्री भरत का प्रयाग में भरद्वाज जी से मिलना - Meeting of Sri Bharata with Bhardwaj in Prayag
❀ भरद्वाज जी द्वारा अयोध्यावासियों का सत्कार - Welcome of Ayodhya residents by Sri Bhardwaj
❀ इंद्र-बृहस्पति जी संवाद - Dialogue of Indra and Bruhaspati
❀ श्री भरत का चित्रकूट आगमन - Arrival of Bharata in Chitrakoot
❀ श्री राम-लक्ष्मण को भरत जी के आगमन की सूचना और श्री लक्ष्मण का क्रोध - Sri Rama and Lakshmana to get news of Bharata's arrival and anger of Sri Lakshmana
❀ श्री राम का लक्ष्मण जी को श्री भरत की महिमा बताना - Sri Rama to tell glory of Sri Bharata to Lakshmana
❀ श्री राम-भरत मिलाप - Meeting of Sri Rama and Bharata
❀ श्री दशरथ जी का श्राद्ध - Memorial Service of Sri Dasharatha
❀ वनवासियों द्वारा अयोध्यावासियों का सत्कार - Treat of Ayodhya Residents by Forest Dwellers
❀ श्री वशिष्ठ जी का भाषण - Speech of Sri Vashishtha
❀ श्री राम-भरतादि का संवाद - Dialogue of Sri Rama and Bharata etc.
❀ जनक जी का चित्रकूट पहुँचना - Arrival of Sri Janaka in Chitrakoot
❀ श्री कौशल्या-सुनयना संवाद - Dialogue of Sri Kaushalya and Sunayana
❀ श्री जनक-सुनयना संवाद - Dialogue of Sri Janaka and Sunayana
❀ श्री जनक-वशिष्ठादि संवाद - Dialogue of Sri Janaka and Sri Vashishtha Etc.
❀ श्री राम-भरत संवाद - Dialogue of Sri Rama and Bharata
❀ श्री भरत द्वारा तीर्थ जल स्थापना - Sri Bharata to install sacred places' water
❀ श्री भरत का श्री राम-पादुका लेना - Sri Bharata to take Sri Rama's Slippers
❀ श्री भरत जी का अयोध्या लौटना - Return of Bharata to Ayodhya

यह भी जानें

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विनय पत्रिका

गोस्वामी तुलसीदास कृत विनयपत्रिका ब्रज भाषा में रचित है। विनय पत्रिका में विनय के पद है। विनयपत्रिका का एक नाम राम विनयावली भी है।

श्री रामचरितमानस: सुन्दर काण्ड: पद 41

बुध पुरान श्रुति संमत बानी । कही बिभीषन नीति बखानी ॥ सुनत दसानन उठा रिसाई ।..

श्री रामचरितमानस: सुन्दर काण्ड: पद 44

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू । आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ॥ सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं ।..

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