जगन्नाथ लक्ष्मी नारायण भेश या थियाकिया भेश (Jagannath Laxmi Narayan Bhesh or Thiakia Bhesh)

कार्तिक शुक्ल एकादशी को महाप्रभु का लक्ष्मी नारायण भेश या थियाकिया भेश होता है। अबकाश अनुष्ठान के बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी में महाप्रभु को ठियाकिया भेश पहनाया जाता है। यह भेस भोगमंडप अनुष्ठान के अंत तक जारी रहता है।
भेश धारण करने की रस्में:
इस भेश में महाप्रभु जगन्नाथ और बलभद्र को स्वर्ण भुजाएँ, पैर, कदंब माली, किरीति, हरिदा माली, बहादा माली, तबीज़ा माली, बगनाखी माली, सेबती माली, आदि से विभूषित किया जाता है।

श्री बलभद्र के पास हल मुशाला और श्री जगन्नाथ के पास शंख चक्र पकड़ते हैं। वे दोनों एक-एक त्रिशाखा पोशाक और एक-एक तिलक पहनते हैं। वे श्रीमुख पद्म भी पहनते हैं। मां सुभद्रा को किरीती, कर्णकुंडल, विभिन्न प्रकार की मालाएं, ओडियानी, चंद्र सूर्य और तदगी से विभूषित किया जाता है।

चेहरे पर श्रीमुख बाला के साथ तीन देवताओं की पूजा की जाती है। जगन्नाथ और बलभद्र के सिरों पर दो शंक्वाकार त्रिमुंडी चूला चढ़ाया जाता है जिसमें किया के फूलों के समान सोने की छड़ें जुड़ी होती हैं। ये दोनों कर्ण कुंडल धारण करते हैं।

अतीत में, रामानुज संप्रदाय मठ के महंत भेश को देखते थे और भगवान के सामने श्रीमन नारायण स्तोत्र गाते थे। हर साल कार्तिक शुक्ल एकादशी को महाप्रभु का लक्ष्मी नारायण भेश या थियाकिया भेश होता है।
Jagannath Laxmi Narayan Bhesh or Thiakia Bhesh - Read in English
The laxmi narayan bhesh or thiakia bhesh of mahaprabhu takes place on kartika shukla ekadashi.
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