भक्तमाल: वासुपूज्य
अन्य नाम - श्री वासुपूज्य भगवान, श्री वासुपूज्य स्वामी भगवान
शिष्य - श्री अमर, 116 गणधर
आराध्य - जैन धर्म
उम्र: 7,200,000
ऊंचाई - 70 धनुष
रंग - लाल
जन्म स्थान - चम्पापुर
जन्म दिवस - आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि।
निर्वाण स्थान: चंपापुर
वैवाहिक स्थिति – विवाहित
पिता - राजा वासुपूज्य
माता - रानी जया देवी
प्रसिद्धि - जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर
वंश: इक्ष्वाकु
प्रतीक (लंछन): भैंस
वासुपूज्य स्वामी जी जैन धर्म में ग्यारहवें तीर्थंकर
श्रेयांसनाथ के बाद 12वें तीर्थंकर हैं । उनकी पवित्रता, करुणा और आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए उनकी पूजा की जाती है।
सभी तीर्थंकरों में वासुपूज्य स्वामी जी विशेष हैं क्योंकि:
वासुपूज्य स्वामी जी ने पांचों कल्याणक (जन्म, वैराग्य, सर्वज्ञता, उपदेश और निर्वाण) एक ही स्थान - चंपापुरी में प्राप्त किए। यही कारण है कि चंपापुरी जैन धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। उन्होंने चंपापुरी में मोक्ष प्राप्त किया और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हुए।
श्री वासुपूज्य स्वामी जी की आध्यात्मिक शिक्षाएँ
❀ अहिंसा
❀ सत्य (सच्चाई)
❀ अपरिग्रह
❀ आध्यात्मिक अनुशासन और आत्म-संयम
श्री वासुपूज्य स्वामी जी के रोचक तथ्य
❀ वासुपूज्य स्वामी जी ने बचपन से ही सांसारिक सुखों से विरक्ति दिखाई।
❀ उन्होंने राजसी जीवन त्याग दिया और गहन तपस्या की।
❀ ध्यान और तपस्या के माध्यम से उन्होंने केवल ज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त की।
❀ उन्होंने अहिंसा (अहिंसा), सत्य और आत्म-अनुशासन के मार्ग का प्रचार किया।
वासुपूज्य स्वामी जी का जीवन यह शिक्षा देता है कि सच्ची विजय स्वयं की इच्छाओं और अहंकार पर होती है, न कि दूसरों पर।
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