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दिव्य सामौर बाबा मंदिर बना आकर्षक पर्यटन स्थल (Divya Samor Baba Temple Became an Attractive Tourist Destination)

दिव्य सामौर बाबा मंदिर बना आकर्षक पर्यटन स्थल
दिव्य समोर बाबा मंदिर, किंवदंतियों के अनुसार जब स्वयंभू शिवलिंग 400 साल पहले तालाब के किनारे अवतरित हुए थे, उस स्थान पर समोर बाबा मंदिर का निर्माण किया गया था। पानी के तालाब के समीप होने के कारण इसे समोर भी कहा जाता है और भगवान शिव हमेशा अपने भक्तों द्वारा बाबा कहलाते थे, इसलिए भक्त इस मंदिर को समोर बाबा मंदिर के नाम से पुकारते हैं।
अब यह दिव्य सामौर बाबा मंदिर का पुनरुद्धार होने वाला है। लगवग 5 करोड़ की लागत के साथ मंदिर को आकर्षक रूप दिया जायेगा और आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में प्रख्यात किया जाएगा। पूरे प्रोजेक्ट का ब्लू प्रिंट तैयार किया गया है जो की बहुत आकर्षक है। 5 करोड की लागत से दिव्य सामौर बाबा मंदिर का सौन्दर्यीकरण का परयोजना किया गया है और जिसका शिलान्यास उत्तरप्रदेश की पर्यटन मंत्री द्वारा किया गया है।

मंदिरों का पुनर उधर एक अत्यंत उत्तम विचार है, यह मंदिरों की कलाकृति और इतिहास संस्कृति को सरंक्षित रखने के साथ साथ एक उत्तम पर्यटन स्थल के रूप में भक्तों को आकर्षित करता है। अब दिव्य सामौर बाबा मंदिर भी आकर्षक पर्यटन स्थल में परवर्तित होने वाला है, जो कि स्वागत योग्य पदक्षेप है।

Divya Samor Baba Temple Became an Attractive Tourist Destination in English

Divine Samor Baba Mandir temple is about to be revived. The temple will be given an attractive look with a cost of about 5 crores and will be famous as an attractive tourist destination. A Blueprint of the entire project has been prepared which is very attractive.
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तुलाभारम क्या है, तुलाभारम कैसे करें?

तुलाभारम और तुलाभरा जिसे तुला-दान के नाम से भी जाना जाता है, एक प्राचीन हिंदू प्रथा है यह एक प्राचीन अनुष्ठान है। तुलाभारम द्वापर युग से प्रचलित है। तुलाभारम का अर्थ है कि एक व्यक्ति को तराजू के एक हिस्से पर बैठाया जाता है और व्यक्ति की क्षमता के अनुसार बराबर मात्रा में चावल, तेल, सोना या चांदी या अनाज, फूल, गुड़ आदि तौला जाता है और भगवान को चढ़ाया जाता है।

हिंदू धर्म में पूजा से पहले संकल्प क्यों लिया जाता है?

संकल्प का सामान्य अर्थ है किसी कार्य को करने का दृढ़ निश्चय करना। हिंदू धर्म में परंपरा है कि किसी भी तरह की पूजा, अनुष्ठान या शुभ कार्य करने से पहले संकल्प लेना बहुत जरूरी होता है।

भगवान जगन्नाथ के अलग-अलग बेश?

बेश एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है पोशाक, पोशाक या पहनावा। 'मंगला अलाती' से 'रात्रि पहुड़' तक प्रतिदिन, पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर की 'रत्नवेदी' पर देवताओं को सूती और रेशमी कपड़ों, कीमती पत्थरों से जड़े सोने के आभूषणों, कई प्रकार के फूलों और अन्य पत्तियों और जड़ी-बूटियों से सजाया जाता है। जैसे तुलसी, दयान, मरुआ आदि। चंदन का लेप, कपूर और कभी-कभी कीमती कस्तूरी का उपयोग दैनिक और आवधिक अनुष्ठानों में किया जाता रहा है।

नेत्र उत्सव

नेत्रोत्सव रथ यात्रा से एक दिन पहले आयोजित किया जाता है।

भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद मिट्टी के बर्तन में क्यों बनाया जाता है?

जगन्नाथ मंदिर में स्थित रसोई को दुनिया की सबसे बड़ी रसोई भी कहा जाता है। यहां भगवान जगन्नाथ के लिए 56 भोग का प्रसाद भी बनाया जाता है।

जगन्नाथ मंदिर प्रसाद को 'महाप्रसाद' क्यों कहा जाता है?

जगन्नाथ मंदिर में सदियों से पाया जाने वाला महाप्रसाद लगभग 600-700 रसोइयों द्वारा बनाया जाता है, जो लगभग 50 हजार भक्तों के बीच वितरित किया जाता है।

भगवान अलारनाथ की कहानी: श्री जगन्नाथ कथा

अनासार के दौरान जब भगवान जगन्नाथ बीमार हो जाते हैं, तब अलारनाथ मंदिर परिसर मे भगवान को खीर का भोग लगाया जाता है तथा साथ ही साथ भक्तों को भी यही भोग भेंट किया जाता है।

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