मन को कभी भी निराश न होने दें: प्रेरक कहानी (Man Ko Kabhi Bhi Nirash Na Hone Den)


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सुबह होते ही, एक भिखारी सेठजी के घर पर भिक्षा मांगने के लिए पहुँच गया। भिखारी ने दरवाजा खटखटाया, सेठजी बाहर आये पर उनकी जेब में देने के लिए कुछ न निकला। वे कुछ दुखी होकर घर के अंदर गए और एक बर्तन उठाकर भिखारी को दे दिया।

भिखारी के जाने के थोड़ी देर बाद ही वहां सेठजी की पत्नी आई और बर्तन न पाकर चिल्लाने लगी: अरे! क्या कर दिया आपने चांदी का बर्तन भिखारी को दे दिया। दौड़ो-दौड़ो और उसे वापिस लेकर आओ।

सेठजी दौड़ते हुए गए और भिखारी को रोक कर कहा: भाई मेरी पत्नी ने मुझे जानकारी दी है कि यह गिलास चांदी का है, कृपया इसे सस्ते में मत बेच दीजियेगा।

वहीँ पर खड़े सेठजी के एक मित्र ने उससे पूछा: मित्र! जब आपको पता चल गया था कि ये गिलास चांदी का है तो भी उसे गिलास क्यों ले जाने दिया?

सेठजी ने मुस्कुराते हुए कहा: मन को इस बात का अभ्यस्त बनाने के लिए कि वह बड़ी से बड़ी हानि में भी कभी दुखी और निराश न हो!

मन को कभी भी निराश न होने दें, बड़ी से बड़ी हानि में भी प्रसन्न रहें। मन उदास हो गया तो आपके कार्य करने की गति धीमी हो जाएगी। इसलिए मन को हमेशा प्रसन्न रखने का प्रयास।

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