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निस्वार्थ भाव से दान पुण्य करें - प्रेरक कहानी ( Nisvarth Bhav Se Dan Puny Karen)


निस्वार्थ भाव से दान पुण्य करें - प्रेरक कहानी
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एक गांव पहाड़ों के बीच में बसा हुआ था। वहाँ का ठाकुर बहुत ही परोपकारी व्यक्ति था। उस के पूर्वजों की सजा उस को मिली थी उस की पत्नी इस दुनिया में नहीं रही।
उसका एक बेटा था जो इस जगत को देख नहीं सकता था पर ठाकुर को उस परमात्मा पर विश्वास था कि प्रभु की कृपा से एक दिन उस का बेटा सही हो जायेगा। वह इस सोच मै पुण्य दान करता था कि कभी ना कभी प्रभु की कृपा रहेगी।

ऐसे ही करते कुछ साल बीत गये अब ठाकुर को चिंता होने लगी कि मेरे मरने के बाद मेरे बेटे का क्या होगा उस की चिंता दिन पर दिन खाई जा रही थी।

तभी स्वर्ग लोक मे नारद जी नारायण-नारायण बोलते हुए ब्रह्मा जी के पास जाते है और बोलते है: प्रभु ये क्या? आप कितने निर्दय है, आप उस मानव की सहायता क्यों नहीं करते वो रोज पुण्य दान करता है।

फिर भी आप उस कष्ट दे रहे हो आप बड़े स्वार्थी हो आप को उस का दुख नहीं दिखता क्या?

तब ब्रह्मा मुस्कराए और बोले: इसमे मेरा क्या स्वार्थ है नारद मुनि?

तब नारद मुनि शिवजी के पास जाते है और वही बात शिवजी से भी करते है तब उन की बात सुनकर शिव जी हंसते लगते है और बोलते है: इंसान स्वार्थी है।

ये बात सुनकर उन्हें और गुस्सा आगया और वो वहाँ से विष्णु जी पास आए और अपनी बात बताई तब विष्णु जी बोल: जिस दिन ठाकुर निस्वार्थ पुण्य करेगा मै उस दिन उस की परेशानी को खत्म कर दूँगा।

नारद जी बोले: प्रभु! वो रोज पूजा पाठ करता है दान करता है फिर भी आप कहते हो ये स्वार्थ है, तो इस प्रकार जगत मै सभी स्वार्थी हैं।

तब विष्णु जी बोले: हाँ!
नारद जी बोलते है: तब तो ठाकुर की परेशानी का कोई हल नहीं उस का दान-पुण्य सब बेकार है।

विष्णु जी कहते है: जब ठाकुर निस्वार्थ काम करेगा तब सब अपने आप सही हो जायेगा।

प्रभु नारद से बोल: तुम धरती लोक पर जाओ और खुद ठाकुर की परीक्षा लो।

नारद जी धरती पर जाते है वह एक बच्चे का रूप ले लेते है भूखा-नंगा सा रूप ले के ठाकुर के गाँव में पहुँच जाते है।

एक दिन ठाकुर मन्दिर जा रहे थे तभी रास्ते मे उनकी नजर उस बच्चे पर पड़ी उन्होंने उस बच्चे से पूछा: बेटा कहाँ से आए हो और तुम्हारे माँ-बाप कहाँ है।

तब बच्चा बोलता है: बाबूजी! भूख लगी है कुछ दो खाने को।

ठाकुर को उस बच्चे की हालत पर तरस आता है और वो उसे पूजा के लिए जो प्रसाद बनाया था उसे दे देते हैं। बिना पूजा किए घर लौट जाते है, उस बालक को भी घर ले आते है और उसे अपने साथ हवेली मे रहने देते है।

अब ठाकुर उस बालक को अपने बेटे जैसा पालने लगा इस तरह कही वर्ष बीत गए। एक दिन रात मे नारद जी ठाकुर के सामने प्रकट हुए।

बोले: ठाकुर! मै तुम्हारी सेवा से खुश हुआ कोई एक वरदान मागो।

ठाकुर के आंखो मे आंसू आ जाते है और बोलता है: मै कितना स्वार्थी था। प्रभु आप नहीं जानते जिस दिन आप मुझे भूखे मिले थे सिर्फ उस दिन मेरे मन मे कोई स्वार्थ नहीं था उसी रात को मेरे बेटे की आंखो मे रोशनी आ गई थी मैंने ये बात किसी को नहीं बताई आज भी मेरा बेटा उसी हालत मे अपने कमरे मे है।
बस मै तो बिना स्वार्थ के आप की सेवा कर रहा था।

यह जान कर नारद बड़े हैरत मै पड गए की आखिर ये चमत्कार किस ने किया फिर भी नारद बोले – आप मुझसे कोई वरदान मागों।

तब ठाकुर बोलता है: प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए बस आप ने मेरे घर को रोशन कर दिया है।

नारद जी वहाँ से विदा लेकर स्वर्ग लोक मे आते है। विष्णु, शिव और ब्रह्मा जी को एक साथ देख कर हैरत मे पड जाते है।

और बोलते है: प्रभु! आप ने मुझे जिस दिन धरती पर जाने को बोला उसी दिन आपने ठाकुर की इच्छा पूरी कर दी, क्या उस दिन वह स्वार्थी नहीं था।

तब विष्णु जी बोले: उस दिन जब तुम ठाकुर के पास भूखे गए थे, तब ठाकुर ने बिना स्वार्थ तुमको भोजन करवाया ये पुण्य से कम नहीं था। मै यही चाहता हूँ कि बिना स्वार्थ कोई किसी की मदद करे।

तब शिव जी बोलते है: हे मुनि! आप ने तो उसी दिन उस वरदान दे देना चाहिए था जब उस ने आप को भोजन करवाया आप ने तो वर्षों लग दिए क्या आप स्वार्थ से परिचित नहीं थे।

नारद मुनि बोलते है: प्रभु! आप की माया से मै अपरिचित हूँ आप ने मुझे बोला ठाकुर की परीक्षा लो पर आप तो मेरी भी परीक्षा ले रहे थे।

तब ब्रह्मा जी बोलते है: स्वार्थ का मतलब होता है, केवल अपने लाभ की बात सोचना, दूसरों के लाभ और भले की बात नहीं सोचना, सही मायने मे वही स्वार्थी है।

अतएव जो ज्ञानी है, जिसने भगवान से अपना लक्ष्य सिद्ध करने का लक्ष्य बनाया, वो भगवान सम्बन्धी स्वार्थी है।
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