एक गरीब मूर्तिकार, जिसे पूरे शहर ने चोर समझ लिया था, लेकिन सच्चाई यह थी कि स्वयं भगवान जगन्नाथ उसके सबसे बड़े मित्र बन चुके थे। एकबार जगन्नाथ पुरी नगरी में एक समय ऐसा चमत्कार हुआ जिसे सुनकर आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं।
यह कथा है रामू नाम के एक निर्धन मूर्तिकार की, जिसकी झोपड़ी में गरीबी, भूख एवं संघर्ष था, लेकिन उसके हृदय में जगन्नाथ जी के लिए अटूट प्रेम था। उसकी दुनिया सिर्फ उसके छोटे बेटे कान्हा तक सीमित थी। पत्नी वर्षों पहले संसार छोड़ चुकी थी और अब रामू अपने नन्हे बेटे को पालने के लिए दिन-रात लकड़ी की मूर्तियां बनाता था।
लेकिन दुर्भाग्य ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। एक ओर भीषण बारिश के कारण उसकी कोई मूर्ति नहीं बिक रही थी, दूसरी ओर उसका बेटा तेज बुखार से तप रहा था।
जब घर में खाने का एक दाना तक नहीं बचा, तब रामू अपनी सबसे सुंदर बनाई हुई जगन्नाथ जी की मूर्ति लेकर मंदिर पहुंचा। उसे विश्वास था कि कोई न कोई भक्त उसकी कला को खरीद लेगा और वह अपने बेटे के लिए दवा और भोजन जुटा पाएगा। लेकिन मंदिर के बाहर बैठे धनवान लोगों ने उसकी ओर देखा तक नहीं। उल्टा मंदिर का घमंडी रक्षक विक्रम उसे अपमानित करने लगा। उसने रामू को भिखारी कहकर मंदिर की सीढ़ियों से धक्का दे दिया। रामू की बनाई हुई
सुंदर मूर्ति टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो गई। घायल रामू की आंखों से आंसू बह निकले। उसने मंदिर के शिखर की ओर देखकर दर्द भरी आवाज में कहा- हे जगन्नाथ, क्या आप केवल अमीरों के भगवान हैं? क्या मेरे जैसे गरीब की पुकार आपके कानों तक नहीं पहुंचती?
उस रात जब रामू टूटा हुआ मन लेकर अपनी झोपड़ी लौटा तो वहां एक ऐसा दृश्य उसका इंतजार कर रहा था जिसे देखकर उसकी सांसें थम गईं। झोपड़ी के भीतर
दिव्य प्रकाश फैला हुआ था। उसका बीमार बेटा कान्हा हंस रहा था और उसके पास एक सांवला, अत्यंत सुंदर बालक बैठा था। वह अपने हाथों से कान्हा को गरमा-गरम महाप्रसाद खिला रहा था।
बालक के चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जिसे देखकर सारे दुख मिट जाएं। उसने रामू से कहा- काका, चिंता मत करो। तुम्हारा बेटा अब ठीक हो जाएगा। मैं तो बस तुम्हारा कर्ज चुकाने आया हूं।
इतना कहकर वह बालक अचानक अदृश्य हो गया और पीछे छोड़ गया मंदिर की राजसी मोहर लगी एक स्वर्ण थाली।
सुबह होते ही मंदिर में हड़कंप मच गया। भगवान के भंडार से वही स्वर्ण थाली गायब थी। सैनिकों ने खोज शुरू की और वह थाली रामू की झोपड़ी में मिल गई। बिना कुछ सुने उसे चोर घोषित कर दिया गया। उसके हाथों में बेड़ियां डाल दी गईं। उसका मासूम बेटा रोता रहा, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। पूरा शहर उसे अपराधी मान चुका था। राजा ने आदेश दिया कि अगले दिन सूर्योदय पर रामू को फांसी दे दी जाए।
कालकोठरी में बैठा रामू पूरी रात रोता रहा। उसे अपनी मौत का भय नहीं था, उसे चिंता थी अपने बेटे की। उसने आंसुओं से भीगी आंखों से प्रभु को पुकारा। तभी अचानक वही सांवला बालक फिर दिखाई दिया। उसने रामू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-
डरो मत काका, कल पूरी दुनिया देखेगी कि सच्चे भक्त का साथ मैं कभी नहीं छोड़ता।
अगली सुबह फांसी का मैदान लोगों से भर गया। रामू के गले में फंदा डाल दिया गया। तभी अचानक मंदिर की दिशा से भयंकर गर्जना सुनाई दी। धरती कांपने लगी।
मंदिर के मुख्य पुजारी भागते हुए आए और चिल्लाए- रुको! यह फांसी नहीं हो सकती। प्रभु स्वयं क्रोधित हैं। उनकी आंखों से रक्त के आंसू बह रहे हैं। मंदिर की दीवारें कांप रही हैं और उनका सबसे कीमती नवरत्न हार भी गायब हो गया है।
यह सुनकर सब स्तब्ध रह गए। तभी एक और चमत्कार हुआ। रामू के फटे हुए कुर्ते की जेब से दिव्य प्रकाश निकलने लगा। जब प्रकाश शांत हुआ तो सबने देखा कि भगवान जगन्नाथ का वही नवरत्न हार रामू की जेब से बाहर झलक रहा था। पूरा मैदान सन्न रह गया। राजा के हाथ कांपने लगे। पुजारियों के चेहरे से रंग उड़ गया। अब सब समझ चुके थे कि यह कोई साधारण गरीब नहीं, बल्कि भगवान का प्रिय भक्त है।
उसी क्षण आकाश में गूंजती हुई दिव्य आवाज सुनाई दी-
मुझे सोने के हार नहीं चाहिए। मुझे अपने भक्त का प्रेम चाहिए। तुमने जिस रामू को चोर समझा, उसके लिए मैं स्वयं उसके घर गया था। जिस फंदे पर तुम उसे चढ़ाने जा रहे थे, उस पर चढ़ने के लिए मैं तैयार था। याद रखो, मेरे सच्चे भक्त पर संकट आए तो जगत का स्वामी स्वयं उसकी ढाल बन जाता है।
पूरा मैदान
जय जगन्नाथ के नारों से गूंज उठा। राजा रामू के चरणों में गिर पड़ा। घमंडी रक्षक विक्रम रो-रोकर क्षमा मांगने लगा। लेकिन रामू की नजर भीड़ पर नहीं थी। वह उस सांवले बालक को खोज रहा था जो थोड़ी दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसके गले में अब सोने का हार नहीं, बल्कि रामू के हाथों से बनी साधारण लकड़ी की माला थी।
कहते हैं, उस दिन के बाद पूरी के मंदिर में नियम बदल गए। किसी भक्त को उसकी गरीबी, उसके वस्त्र या उसकी स्थिति देखकर कभी नहीं आंका गया। और रामू की छोटी सी झोपड़ी भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बन गई। लोग कहते हैं कि आज भी जब कोई भक्त सच्चे मन से जगन्नाथ जी को पुकारता है, तो एक सांवला मुस्कुराता हुआ बालक चुपके से उसकी मदद करने जरूर पहुंचता है। क्योंकि भगवान को सोने के महल नहीं, प्रेम से भरा हुआ हृदय सबसे अधिक प्रिय होता है।
जय जगन्नाथ ! जय जगन्नाथ !