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पतिव्रता नारी (Pativrata)

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पतिव्रता नारियों के बारे में बहुत कुछ सनातन ग्रंथों में लिखा है। भक्ति भारत आपको पतिव्रता नारी कैसी होनी चाहिए इसके बारे में श्री शिव महापुराण के माध्यम से आप तक पहुँचा रहे हैं।
इस जगत्में पतिव्रता नारी ही धन्य है, इसके अतिरिक्त और कोई नारी पूजाके योग्य नहीं है। वह सब लोगोंको पवित्र करनेवाली तथा समस्त पापोंको दूर करनेवाली है। ९ ॥

हे शिवे! जो स्त्री अपने स्वामीकी परमेश्वरके समान सेवा करती है, वह यहाँ अनेक भोगोंको भोगकर अन्तमें पतिके साथ उत्तम गतिको प्राप्त होती है॥ १०॥
सावित्री, लोपामुद्रा, अरुन्धती, शाण्डिल्या, शतरूपा, अनसूया, लक्ष्मी, स्वधा, सती, संज्ञा, सुमति, श्रद्धा, मेना और स्वाहा आदि बहुत-सी पतिव्रताएँ हैं, जिन्हें विस्तारके भयसे यहाँ नहीं कह रही हूँ॥११-१२॥
ये सभी पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे ही जगत्में मान्य तथा पूज्य हुईं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर एवं अन्य मुनीश्वरोंने भी इनका सम्मान किया है॥ १३॥

स्त्रीको चाहिये कि जब अपना प्रिय पति भोजन कर ले, तब स्वयं पतिभक्तिमें परायण होकर भोजन
करे। हे शिव! जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्रीको भी खड़ा ही रहना चाहिये॥ १६॥
पतिके सो जानेपर स्वयं शयन करे और उसके उठनेसे पहले स्वयं जाग जाय, पतिका सर्वदा छलरहित हो हित करे। हे शिवे! कभी अलंकारसे रहित हो अपने स्वामीके सम्मुख न जाय। जब स्वामी कार्यवश परदेश चला जाय, तो कभी शरीरका संस्कार एवं शृंगार न करे॥ १७-१८॥
पतिव्रता स्त्रीको चाहिये कि वह पतिका नाम कभी न ले, पतिके द्वारा क्रुद्ध होकर कठोर वचन कहनेपर भी उसे बुरा वचन न कहे और पतिके शासित करनेपर भी प्रसन्न रहे। उस समय भी यही कहे कि स्वामिन्! और अधिक दण्ड देकर मेरे ऊपर कृपा कीजिये॥ १९॥
पतिके बुलानेपर घरका सारा कामकाज छोड़कर उनके समीप जाय और शीघ्रतासे प्रणामकर हाथ जोड़कर उनसे प्रेमपूर्वक कहे। हे स्वामिन्! आपने किसलिये बुलाया है, कृपाकर आज्ञा दीजिये, इसके बाद उस आज्ञाको प्रसन्नतापूर्वक सम्पन्न करना चाहिये॥ २०-२१॥

दरवाजेपर खड़ी होकर बहुत कालतक इधर-उधर न देखे और न तो दूसरेके घर जाय। किसीका भेद लेकर किसी अन्यके सामने उसको प्रकाशित न करे॥ २२॥
बिना कहे ही पतिके लिये पूजनकी सामग्री प्रस्तुत करे और पतिके हितके लिये निरन्तर अवसरकी प्रतीक्षा करती रहे। पतिकी आज्ञाके बिना कभी भी तीर्थयात्राके लिये न जाय और किसी समाज तथा उत्सवको देखनेके लिये भी न जाय। जिस स्त्रीको तीर्थयात्राकी इच्छा हो, वह अपने स्वामीका चरणामृत लेकर सन्तुष्ट हो जाय; क्योंकि पतिके चरणोदकमें सभी तीर्थ एवं क्षेत्र निवास करते हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ २३-२५।

पतिके भोजन करनेके पश्चात् उसका उच्छिष्ट जो भी इष्ट अन्नादि हो, उसे पतिप्रदत्त महाप्रसाद समझकर पतिव्रता स्त्री भोजन करे। देवता, पितर, अतिथि, सेवक, गौ एवं भिक्षुकको बिना दिये अन्नका भोजन न करे॥ २६-२७॥

घरकी समग्र सामग्री ठीक तरहसे रखे, नित्यउत्साहयुक्त तथा सावधान रहे और अधिक व्यय न करे, इस प्रकार सर्वदा पातिव्रत्यधर्मका पालन करे॥ २८॥

पतिकी आज्ञाके बिना कोई उपवास तथा व्रत न करे, अन्यथा उसका फल नहीं होता और उसे नरककी प्राप्ति होती है। सुखपूर्वक आनन्दसे बैठे हुए तथा अपनी इच्छासे रमण करते हुए पतिको आवश्यक कार्य आ पड़नेपर भी न उठाये। पति क्लीब, दुर्गतिमें पड़ा हुआ, वृद्ध, रोगी, सुखी अथवा दुखी चाहे जैसा ही क्यों न हो, उसका अपमान न करे॥ २९-३१॥

मासिक धर्म प्राप्त हो जानेपर आरम्भसे तीन रात्रिपर्यन्त अपना मुख पतिको न दिखाये और जबतक चौथे दिन स्नानसे शुद्ध न हो, अपना शब्द भी न सुनाये॥ ३२॥
ऋतुस्नान करनेके पश्चात् पतिका ही मुख देखे, कभी अन्यका मुख न देखे अथवा पतिके न होनेपर पतिका ध्यानकर सूर्यका दर्शन करे॥३३॥
पतिके आयुष्यकी इच्छा करनेवाली पतिव्रता स्त्रीको हरिद्रा, कुंकुम, सिन्दूर, काजल, कूर्पासक, ताम्बूल, मांगलिक आभूषण, केशोंका संस्कार, केशपाश बनाना, हाथमें कंगन एवं कानोंमें कर्णफूल नित्य धारण करना चाहिये, इसका परित्याग कभी किसी भी अवस्थामें न करे॥ ३४-३५॥

व्यभिचारिणी स्त्रीसे कभी मित्रता न करे। जो स्त्री अपने पतिसे द्वेष करती हो, उससे बातचीत न करे, कभी अकेली न रहे और न नग्न होकर कभी स्नान करे॥ ३६-३७॥

ओखली, मूसल, बुहारी (झाड़), सिल, लोढ़ा तथा देहलीपर सती स्त्री कभी न बैठे॥३८॥

सहवासके अतिरिक्त और किसी समय पतिसे धृष्टता न करे। अपना पति जिससे प्रेम करे, उसीसे प्रेम करे॥ ३९॥
के प्रसन्न होनेपर प्रसन्न रहे, पतिके पतिव्रता स्त्री सदैव सम्पत्ति तथा विपत्ति दोनों अवस्थाओंमें एकरूप रहे। विकार उपस्थित होनेपर कभी विकृत न हो और सदैव धैर्य धारण करे॥४१॥

घी, नमक, तेल आदिके न होनेपर भी पतिव्रता स्त्री पतिसे 'नहीं है'-ऐसा न कहे और पतिको किसी असाध्य कार्यमें नियुक्त न करे। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवसे भी अधिक पतिका महत्त्व है। अतः हे देवेशि! पतिव्रता अपने पतिको साक्षात् शिवस्वरूप ही समझे॥ ४२-४३॥

पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करके जो स्त्री व्रत, उपवास तथा नियमादिका आचरण करती है, वह अपने पतिकी आयुका हरण करती है और मरनेपर नरक प्राप्त करती है। जो स्त्री क्रुद्ध होकर पतिके कुछ कहनेपर उसका प्रत्युत्तर करती है, वह ग्रामकी कुतिया अथवा निर्जन वनमें शृगाली होती है॥४४-४५॥
स्त्रीको चाहिये कि वह पतिसे ऊँचे स्थानपर न बैठे, दुष्टोंके समीप न जाय और कभी भी पतिसे कातर वाक्य न कहे। किसीकी निन्दा या आक्षेपयुक्त बात न कहे, दूरसे ही कलहका परित्याग करे, गुरुजनोंके समीप कभी जोरसे न बोले और न जोरसे हँसे॥४६-४७॥

पतिको बाहरसे आया हुआ देखकर शीघ्रतासे अन्न, जल, भोजन, ताम्बूल, वस्त्र, पादसंवाहन, खेद दूर करनेवाले मीठे वचनके द्वारा जो स्त्री अपने स्वामीको प्रसन्न रखती है, मानो उसने त्रैलोक्यको प्रसन्न कर लिया॥ ४८-४९॥

माता, पिता, पुत्र, भाई तो स्त्रीको बहुत थोड़ा ही सुख देते हैं, परंतु पति तो अपरिमित सुख देता है। इसलिये स्त्रीको चाहिये कि वह पतिका सदैव पूजन करे॥ ५०॥

पति ही देवता, गुरु, भर्ता, धर्म, तीर्थ एवं व्रतादि सब कुछ है। इसलिये सब कुछ छोड़कर एकमात्र पतिका ही पूजन करे। जो दुष्ट स्त्री अपने पतिको छोड़कर एकान्तमें दूसरेके पास जाती है, वह वृक्षके कोटरमें रहनेवाली उलूकी होती है॥५१-५२॥

जो स्वामीके द्वारा ताड़न करनेपर स्वयं भी ताड़न करना चाहती है, वह वृषभभक्षिणी व्याघ्री होती है। जो अपने पतिको छोड़कर अन्यसे कटाक्ष करती है, वह केकराक्षी होती है। जो अपने पतिको बिना दिये मिष्टान्न खा लेती है, वह ग्रामसूकरी अथवा अपनी
विष्ठा खानेवाली वल्गु (बकरी) होती है॥५३-५४॥

जो अपने पतिको 'तू' कहकर बोलती है, वह जन्मान्तरमें गूँगी होती है और जो अपनी सपत्नी (सौत)-से डाह करती है, वह बारंबार विधवा होती है।५५॥
जो अपने स्वामीकी दृष्टि बचाकर किसी अन्य पुरुषको देखती है, वह काणी, कुमुखी तथा कुरूपा होती है॥५६॥

जैसे जीवके बिना देह क्षणमात्रमें अशुचि हो जाता है, उसी प्रकार अपने स्वामीके बिना स्त्री अच्छी तरह स्नान करनेपर भी अपवित्र ही रहती है॥५७॥
इस लोकमें उसकी माता धन्य है और उसके पिता भी धन्य हैं तथा उसका वह पति भी धन्य है, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्रीका निवास होता है॥५८॥
पतिव्रता स्त्रीके पुण्यसे उसके पितृवंश, मातृवंश तथा पतिवंशके तीन-तीन पूर्वज स्वर्गमें सुख भोगते हैं ॥ ५९॥
दुराचारिणी स्त्रियाँ अपने दुराचरणके द्वारामाता-पिता तथा पति-इन तीनों कुलोंको नरकमें गिराती हैं और वे इस लोक तथा परलोकमें सदैव दुखी रहती हैं॥ ६०॥

पतिव्रताके चरण जहाँ-जहाँ पड़ते हैं, वहाँ-वहाँकी पृथिवी सदा पापका हरण करनेवाली तथा अत्यन्त पवित्र हो जाती है। सर्वव्यापक सूर्य, चन्द्रमा तथा वायु भी अपनी पवित्रताके लिये ही पतिव्रताका स्पर्श करते हैं, अन्य किसी कारणसे नहीं॥६१-६२॥
जल तो सदैव पतिव्रताका स्पर्श चाहते हैं, वे कहते हैं कि आज इस पतिव्रताके स्पर्शसे हमारी जड़ता नष्ट हो गयी और हमें दूसरेको पवित्र करनेकी योग्यता प्राप्त हुई। भार्या गृहस्थका मूल है, भार्या ही सुखका मूल है, धर्मफलकी प्राप्ति एवं सन्तानवृद्धिके लिये भार्याकी अत्यन्त आवश्यकता है। क्या अपने रूप, लावण्यका गर्व करनेवाली स्त्रियाँ प्रत्येक घरोंमें नहीं हैं, किंतु विश्वेश्वरमें भक्ति करनेसे ही पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है।

भार्याके द्वारा ही इस लोक तथा परलोक-दोनों लोकोंपर विजय प्राप्त की जा सकती है। देवकर्म, पितृकर्म, अतिथिकर्म तथा यज्ञकर्म बिना भार्याके फलवान् नहीं होता। गृहस्थ उसीको कहते हैं, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्रीका निवास है, अन्य स्त्रियाँ तो प्रतिदिन जरा राक्षसीके समान पुरुषको ग्रसती रहती हैं॥ ६६-६७॥

जिस प्रकार गंगास्नानसे शरीर पवित्र हो जाता है, उसी प्रकार पतिव्रता स्त्रीके दर्शनमात्रसे सब कुछ पवित्र हो जाता है॥ ६८॥
गंगा तथा पतिव्रता स्त्रीमें कोई भेद नहीं है। वे दोनों स्त्री-पुरुष शिव तथा पार्वतीके तुल्य हैं, अतः बुद्धिमान् पुरुषको उनका पूजन करना चाहिये॥६९॥
पति ॐकार है, तो स्त्री श्रुति वेद है, पति तप है, तो स्त्री क्षमा है, स्त्री सत्क्रिया है, तो पति उसका फल है। हे शिवे! इस प्रकारके दम्पती धन्य हैं॥ ७०॥
हे पार्वति! इस प्रकारसे मैंने तुमसे पातिव्रत्य- धर्मका निरूपण किया। अब उन पतिव्रताओंके भेद सावधानीके साथ प्रेमपूर्वक सुनो॥ ७१॥
उत्तम आदिके भेदसे पतिव्रता स्त्रियाँ चार प्रकारकी कही गयी हैं। जिनके स्मरणसे पाप नष्ट हो जाते हैं॥ ७२॥
उत्तम, मध्यम, निकृष्ट तथा अतिनिकृष्ट-[ये चार भेद पतिव्रताओंके होते हैं।] अब मैं उनकालक्षण कह रहा हूँ, सावधान होकर उसका श्रवण करो ॥ ७३॥

जिसका मन स्वप्नमें भी अपने पतिको ही देखता है और कभी परपतिमें नहीं जाता; हे भद्रे! वह उत्तम पतिव्रता कही गयी है। जो दूसरोंकेपतियोंको पिता, भ्राता तथा पुत्रके समान सद्बुद्धिसे देखती है, हे पार्वति ! वह मध्यम पतिव्रता कही गयी है।। ७४-७५ ।।
हे पार्वति! जो स्त्री मनमें अपना धर्म समझकर व्यभिचार नहीं करती, वह सुन्दर चरित्रवाली स्त्री निकृष्ट पतिव्रता (अधमा) कही गयी है॥७६॥

जो मनमें इच्छा रहते हुए भी पति एवं कुलके भयसे व्यभिचार नहीं करती, उसको पुरातन लोगोंने अति-निकृष्ट पतिव्रता कहा है॥७७॥
हे शिवे! ये चारों प्रकारकी पतिव्रताएँ पापहरण करनेवाली हैं, सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाली हैं और इस लोक एवं परलोकमें आनन्द प्रदान करनेवाली हैं॥७८॥
पातिव्रत्यके प्रभावसे ही अत्रिप्रिया अनसूयाने तीनों देवताओंकी प्रार्थनापर वाराहके शापसे मरे हुए ब्राह्मणको जीवनदान दिया था॥ ७९॥
हे शिवे! ऐसा जानकर तुमको नित्य प्रेमपूर्वक अपने पतिकी सेवा करनी चाहिये; क्योंकि हे शैलपुत्रि! ऐसा करनेसे तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे॥ ८०॥
तुम तो साक्षात् जगत्की माता तथा महेश्वरी हो और जगत्पिता महेश्वर तुम्हारे साक्षात् पति हैं। तुम्हारे नामके स्मरणमात्रसे स्त्रियाँ पतिव्रता होंगी॥ ८१॥
हे देवि! तुम्हारे आगे इस कथनसे क्या प्रयोजन! फिर भी हे शिवे! संसारके आचरणके अनुसार मैंने तुम्हें यह सब कहा है ॥ ८२॥
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