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देवी पाटन मंदिर - Devi Patan Mandir

मुख्य आकर्षण - Key Highlights

◉ देवी पाटन मंदिर, 51 पवित्र शक्ति पीठों में से एक है।
◉ यह मंदिर माता पाटेश्वरी देवी को समर्पित है।
◉ यह भारत और नेपाल के श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल है।

देवी पाटन मंदिर, बलरामपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर तुलसीपुर में स्थित, माँ पाटेश्वरी (दुर्गा) को समर्पित एक पूजनीय शक्ति पीठ है। इसे देवी सती के 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। परंपरा के अनुसार, देवी सती का दाहिना कंधा (पट) इसी पवित्र स्थान पर गिरा था, जिसके कारण मंदिर का नाम \"देवी पाटन\" पड़ा। यह मंदिर विशेष रूप से मुंडन (सिर मुंडवाने) समारोहों और मन्नतों की पूर्ति के लिए किए जाने वाले अर्पण के लिए प्रसिद्ध है।

जहाँ वामस्कन्ध सहित भगवती सती का पाटम्बर गिरा था। इसीलिए यहाँ स्थापित शक्तिपीठ की देवी का नाम पाटेश्वरी है और उनके नाम पर ही इसे पत्तन (पाटन-नगर) का नाम देवी-पाटन है।
मंदिर का स्थापत्य उत्तर भारत में प्रचलित पारम्परिक मंदिर शैली का है, किन्तु शिखर पर स्थापित स्वर्ण कलश का स्वरूप और शिल्प नेपाली है।

माँ दुर्गा एवं पाताल चबूतरा: अत्यन्त प्राचीन काल से मंदिर के गर्भगृह में स्थित पातालगामी सुरंग के मुहाने पर बने चबूतरे पर एक यन्त्रांकित कपड़ा बिछा रहता है जिस पर फूल अक्षत और प्रसाद चढ़ाकर पातालेश्वरी देवी की पूजा होती है।

अखण्ड दीप-ज्योति: इन अखण्ड दीपों से निकलने वाले काजल की बड़ी महिमा है। भक्त लोग इसका प्रयोग नेत्र रोगों के निवारणार्थ करते हैं और कई श्रद्धालुओं ने इससे चमत्कारिक लाभ की पुष्टि की है।

सूर्य कुण्ड: मंदिर के उत्तर में परिसर के अन्तर्गत ही सूर्यकुण्ड विद्यमान है। जनश्रुति के अनुसार, सूर्यपुत्र महारथी कर्ण द्वारा यहाँ भगवान परशुरामजी से धनुर्वेद की शिक्षा लेते समय प्रतिदिन सूर्योपासना के लिए प्रयुक्त होने वाला यह जलकुण्ड है। इसमें स्नान करने से कुष्ठ रोग सहित तमाम चर्म रोगों का निवारण होता है। वर्तमान रूप में यह काफी बड़ा अण्डाकार जलाशय है।

प्रचलित नाम: माँ पाटेश्वरी मंदिर

समय - Timings

दर्शन समय
5 AM - 10 PM
5:00 AM: मंगला आरती
7:30 AM: श्रृंगार आरती
12:00 Noon: मध्याह्न आरती
6:30 PM: संध्या आरती
8:00 PM: शयन आरती
त्योहार
Navratri, Dussehra | यह भी जानें: एकादशी

देवी पाटन मंदिर का इतिहास

मंदिर निर्माण: अस्तु सत्य युग में यहाँ भगवती सती के वामस्कन्ध सहित पाटम्बर के गिरने, त्रेता में भगवती सीता के यहाँ पाताल में समाने और द्वापर में यहाँ महारथी कर्ण के धनुर्वेद शिक्षण की घटनाओं से सम्बन्धित इस अत्यन्त प्राचीन स्थान पर सर्वप्रथम मंदिर-निर्माण का जो उल्लेख मिलता है, वह महायोगी गुरु श्री गोरक्षनाथ जी से सम्बन्धित है। देवीपाटन में उपलब्ध एक शिलालेख पर अधोलिखित श्लोक मिलता है-

महादेव समाज्ञप्तः सतीस्कन्ध विभूषिताम्।
गोरक्षनाथो योगीन्द्रस्तेने पाटेश्वरीमठीम्।।

अर्थात् महादेव शिव की आज्ञा से योगिराज श्री गोरक्षनाथ जी ने देवी सती का (वाम) स्कन्ध जहाँ गिरा था, वहाँ एक मढ़ी का निर्माण कराया। देवीपाटन में मंदिर निर्माण का यह प्रथम उल्लेख है और इससे यह ज्ञात होता है कि यहाँ देवी (सती) का वाम स्कन्ध गिरा था। पुनश्च शिवावतार के रूप में हठयोग के प्रसिद्ध प्रतिष्ठापक परमाचार्य महायोगी गुरु श्री गोरक्षनाथ जी ने भी यहाँ साधना और उपासना की थी। जनश्रुति है कि वैदिक संस्कृति और धर्मस्थानों के पुनरुद्धर्ता संवत् प्रवर्तक वीर विक्रमादित्य ने कालक्रम से जीर्ण हो गये देवीपाटन के इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। इसके पश्चात् 1,000 वर्षों तक इतिहास के पृष्ठों में इस मंदिर का विशेष उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु बाद के उल्लेखों में यह प्रमाणित है कि यह स्थान नेपाल से लेकर भारत तक लोगों की आस्था और श्रद्धा का निरन्तर केन्द्र बना रहा था, जिसके कारण असहिष्णु मुस्लिम आक्रान्ताओं की कुदृष्टि इस पर पड़ी। सबसे पहले सैय्यद सालारजंग मसूद गाजी ने बहराइच के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर को तोड़ने के बाद, देवीपाटन के मंदिर को भी तोड़ने के लिए अपनी सेना की एक टुकड़ी भेजी थी, जिसे कदाचित् अपने उद्देश्य में प्रबल जन-प्रतिरोध के कारण सफलता नहीं मिली। पुनः एक बार मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने एक सिपहसालार मीर समर को इस मंदिर को ध्वस्त करने के लिए भेजा। कहते हैं- अपने आक्रमण में मीर समर ने मुख्य पूजा स्थल, जो अर्धे के रूप में है और जहाँ से माँ सती का अंग पाताल में समा गया था या सीताजी पाताल में समा गयी थी, उसमें बाँस डालकर उसकी गहरायी नापने का प्रयास किया। अचानक चामत्कारिक रूप से उस सुरंग से भारी संख्या में सारंगा मधुमक्खियाँ बाहर निकलीं और उन्होंने अपने जहरीले दंश से विकल कर विधर्मी सैनिकों को भगा दिया। मधुमक्खियों के इसी प्रत्याक्रमण में जो एक दैवीय चमत्कार के रूप में माना जाता है, मीर समर मारा गया। मंदिर के बाहर परिसर में दांयी ओर अभी भी दैवीय प्रकोप के शिकार मीर समर की कब्र बनी हुई है, जहाँ पहले कभी प्रत्यक्ष रूप से और अब प्रतीक रूप में सूकर की बलि चढ़ायी जाती है।

मंदिर के प्रमाण

स्थिति: श्री माँ पाटेश्वरी शक्तिपीठ, देवीपाटन, उत्तर प्रदेश के वर्तमान बलरामपुर जनपद में तुलसीपुर रेलवे स्टेशन के पश्चिमोत्तर दिशा में लगभग 3 फलाङ्ग पर सिरिया नदी के तट पर स्थित है। इसके उत्तर में नेपाल, दक्षिण में श्री अयोध्या धाम, पूर्व में सिद्धार्थनगर व बस्ती और पश्चिम में गोण्डा व बाराबंकी जनपद है।

नामकरण : शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी का नाम पाटेश्वरी है और यह जहाँ स्थित है, उस स्थान का नाम देवीपाटन है। देवीपाटन का उत्तर-पद पाटन संस्कृत पत्तन शब्द का अपभ्रंश है और इसका अर्थ नगर है। इस प्रकार देवी पाटेश्वरी के नाम पर बसाये गये इस पत्तन-पाटन-नगर का देवीपाटन नाम सर्वथा सार्थक एवं अन्वर्थ है, क्योंकि इस स्थान पर जगदम्बा सती का पाटम्बर-वस्त्र गिरा था, इसलिए कुछ लोग देवी-पाटन में आये पाटन शब्द का संकेत यहाँ गिरे देवी सती के पट-पाट-वस्त्र से मानते हैं, जिसकी पुष्टि एक प्राचीन श्लोक से भी होती है-

पटेन सहितः स्कन्धः, पपात यत्र भूतले।
तत्र पाटेश्वरी नाम्ना ख्यातिमाप्ता महेश्वरी।।

पातालेश्वरी नाम: देवीपाटन स्थित देवी का एक नाम पातालेश्वरी भी प्रसिद्ध है। कहते हैं कि त्रेतायुग में जब अयोध्यापति भगवान श्रीराम ने जनापवाद के भय से जगज्जननी सीता माता को सर्वसमक्ष अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए कहा तो लंका में अपनी वहि शुद्धि प्रमाणित कर चुकी सीताजी ने इसे असह्य अपमान माना और उन्होंने लज्जा से धरती में गड़ते हुए पृथ्वी माता से प्रार्थना की कि वे फट जाएं और उन्हें अपनी गोद में समा लें। सीता माता की प्रार्थना से पृथ्वी फट गयी और उस विवर से एक सिंहासन निकला, जिस पर स्वयं धरती माता बैठी थीं, उन्होंने सीताजी को अपनी गोद में बैठाया और वे उन्हें लेकर वापस पाताल में समा गयीं। माता सीता का पाताल गमन देवी पाटन में ही हुआ था, ऐसा लोगों का विश्वास है। अतः इसका पातालेश्वरी नाम भी लोक प्रसिद्ध है। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में भगवती सीता के पाताल प्रवेश की कथा वर्णित है। देवीपाटन मंदिर के गर्भगृह में पाताल तक चली गयी एक सुरंग अभी भी विद्यमान है, जिसके मुहाने पर एक चबूतरा बना दिया गया है, जिस पर कपड़ा बिछा रहता है और भक्तजन पुष्प, अक्षत और प्रसाद चढ़ाते हैं। मंदिर में मूर्ति स्थापना के बहुत पहले से श्रद्धालुजन इसी विवर स्थल की पूजा पातालेश्वरी देवी के रूप में करते रहे हैं।

नोट: मंदिर का इतिहास एवं तथ्य devipatanmandir.in से लिए गए हैं।

दर्शन समय, प्रमुख त्यौहार एवं कैसे पहुंचें

देवी पाटन मंदिर का दर्शन समय
मंदिर पूरे सप्ताह खुला रहता है और दर्शन का समय सुबह 5:00 बजे से रात 10:00 बजे तक है।

देवी पाटन मंदिर के प्रमुख त्यौहार
नवरात्रि देवी पाटन मंदिर का प्रमुख त्यौहार है। चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि के दौरान हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

देवी पाटन मंदिर कैसे पहुंचें
देवी पाटन मंदिर उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के तुलसीपुर में स्थित है। यह मंदिर लखनऊ, गोंडा, बलरामपुर और आसपास के जिलों से सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। तुलसीपुर रेलवे स्टेशन मंदिर से मात्र 2 किमी दूर है। गोंडा जंक्शन निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन है। निकटतम प्रमुख हवाई अड्डा अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है।

समय माता मंदिर

श्री माँ पाटेश्वरी शक्तिपीठ मंदिर देवीपाटन के परिसर में नव निर्मित यात्री निवास के पीछे समय माई का एक काफी प्राचीन स्थान है। वहाँ एक वृक्ष के नीचे मंदिर बनाकर देवी का स्थान विशिष्ठ बना दिया गया है। समय माता का उल्लेख किसी शास्त्र प्रसिद्ध देवी के रूप में नहीं मिलता है। यह लोकदेवी है। थारूओं के प्रभाव क्षेत्र में अनेक स्थानों पर विभिन्न जनपदों में इनके स्थान मिलते हैं जहाँ लोकजन बड़ी श्रद्धा से पूर्जा-अर्चना करते हैं।

Devi Patan Mandir in English

Devi Patan Temple, located in Tulsipur, about 25 kilometers from Balrampur, is a revered Shakti Peetha dedicated to Devi Pateshwari (Durga). It is considered one of the 51 Shakti Peetha of Devi Sati.

फोटो प्रदर्शनी - Photo Gallery

Photo in Full View
बाबा भैरव नाथ एवं सूर्य कुंड

बाबा भैरव नाथ एवं सूर्य कुंड

जानकारियां - Information

मंत्र / प्रचलित जयकारा
ॐ जय पाटन माता! पाटेश्वरि माता!!
धाम
Devi PateshwariMaa KalikaMaa AnnapurnaBatuk BhairavGuru GorakshnathChandrashekhar MahadevSamay Mata
Nav DurgaBal DeviKarn PratimaAkhand Dhuna
बुनियादी सेवाएं
पेयजल, प्रसाद, सीसीटीवी सुरक्षा, जूता स्टोर, पार्किंग स्थल
धर्मार्थ सेवाएं
संत निवास, यज्ञशाला, विश्राम गृह, यात्री निवास, सभागार, गौशाला, छात्रावास, चिकित्सालय, सूर्य कुण्ड
संस्थापक
गुरु गोरक्षनाथ, विक्रमादित्य
स्थापना
11th century
देख-रेख संस्था
गोरक्षनाथ पीठ
समर्पित
देवी दुर्गा
वास्तुकला
पारंपरिक हिंदू शैली

क्रमवद्ध - Timeline

5 AM - 10 PM

कैसे पहुचें - How To Reach

पता 📧
Siktihwa Tulsipur Uttar Pradesh
सड़क/मार्ग 🚗
Tulsipur - Sirsiya - Bilaspur Road
रेलवे 🚉
Tulsipur Railway Station
हवा मार्ग ✈
Maharishi Valmiki International Airport in Ayodhya
नदी ⛵
Siriya
वेबसाइट 📡
निर्देशांक 🌐
27.5362206°N, 82.3922584°E
देवी पाटन मंदिर गूगल के मानचित्र पर
http://www.bhaktibharat.com/mandir/devi-patan-mandir

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