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आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित दशश्लोकी, न भूमिर्न तोयं न तेजो न वायुः न खं नेन्द्रियं वा न तेषां समूहः । अनैकान्तिकत्वात् सुषुप्त्येकसिद्धः तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥