Shri Krishna Bhajan
गूगल पर भक्ति भारत को अपना प्रीफ़र्ड सोर्स बनाएँ

अपने प्रारब्ध स्वयं अपने हाथों से काटे - प्रेरक कहानी (Apne Prarabdh Swayan Apane Hathon Se Kate)


Add To Favorites Change Font Size
एक गुरूजी थे। हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करते थे। काफी बुजुर्ग हो गये थे। उनके कुछ शिष्य साथ मे ही पास के कमरे मे रहते थे। जब भी गुरूजी को शौच, स्नान आदि के लिये जाना होता था, वे अपने शिष्यो को आवाज लगाते थे और शिष्य ले जाते थे।
धीरे-धीरे कुछ दिन बाद शिष्य दो तीन बार आवाज लगाने के बाद भी कभी आते कभी और भी देर से आते। एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही गुरूजी आवाज लगाते है, तुरन्त एक बालक आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ गुरूजी को निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है। अब ये रोज का नियम हो गया।

एक दिन गुरूजी को शक हो जाता है कि, पहले तो शिष्यों को तीन चार बार आवाज लगाने पर भी देर से आते थे। लेकिन ये बालक तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है। एक दिन गुरूजी उस बालक का हाथ पकड लेते है और पूछते कि सच बता तू कौन है? मेरे शिष्य तो ऐसे नही हैं।

वो बालक के रूप में स्वयं ईश्वर थे, उन्होंने गुरूजी को स्वयं का वास्तविक रूप दिखाया। गुरूजी रोते हुये कहते है, हे प्रभु आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है। यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना।

प्रभु कहते है कि जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है। आप मेरे सच्चे साधक है, हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ। गुरूजी कहते है कि क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है, क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है।

प्रभु कहते है कि, मेरी कृपा सर्वोपरि है, ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है, लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा। यही कर्म नियम है। इसलिए आपके प्रारब्ध स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ।

ईश्वर कहते है! प्रारब्ध तीन तरह के होते है :
मन्द प्रारब्ध: मेरा नाम जपने से कट जाते है।
तीव्र प्रारब्ध: किसी सच्चे संत का संग करके श्रद्धा और विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते है। पर...
तीव्रतम प्रारब्ध: भुगतने ही पडते है।

लेकिन जो हर समय श्रद्धा और विश्वास से मुझे जपते हैं, उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता हूँ।

प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर।
तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्री रघुबीर॥

गुरु स्तुति | गुरु पादुका स्तोत्रम् | श्री गुरु अष्टकम | गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिंद, गुरु मेरा पारब्रह्म | गुरु भजन
यह भी जानें

Prerak-kahani Guru Prerak-kahaniGuru Purnima Prerak-kahaniGuru Mahima Prerak-kahaniShishya Prerak-kahaniStudent Prerak-kahaniBhagwan Dwara Mukti Prerak-kahaniMukti Prerak-kahani

अगर आपको यह prerak-kahani पसंद है, तो कृपया शेयर, लाइक या कॉमेंट जरूर करें!

Whatsapp Channelभक्ति-भारत वॉट्स्ऐप चैनल फॉलो करें »
इस prerak-kahani को भविष्य के लिए सुरक्षित / बुकमार्क करें Add To Favorites
* कृपया अपने किसी भी तरह के सुझावों अथवा विचारों को हमारे साथ अवश्य शेयर करें।

** आप अपना हर तरह का फीडबैक हमें जरूर साझा करें, तब चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक: यहाँ साझा करें।

Latest Prerak-kahani ›

निस्वार्थ भाव से दान पुण्य करें - प्रेरक कहानी

ठाकुर का एक बेटा था, जो इस जगत को देख नहीं सकता था पर ठाकुर को उस परमात्मा पर विश्वास था..

जब काम न रहे तो - प्रेरक कहानी

एक आदमी ने एक भूत पकड़ लिया और उसे बेचने शहर गया, बस पाँच सौ रुपए है। मगर भूत तो भूत ही था। अपना मन ही वह भूत है..

मन की शांति कैसे प्राप्त करें? - प्रेरक कहानी

सेठ अमीरचंद के पास अपार धन दौलत थी। उसे हर तरह का आराम था, लेकिन उसके मन को शांति नहीं मिल पाती थी। हर पल उसे कोई न कोई चिंता परेशान किये रहती थी...

सच्चे देशभक्त की निष्ठा - प्रेरक कहानी

गुलजारीलाल नंदा को मकान मालिक ने किराया न दे पाने पर किराए के मकान से निकाल दिया। बूढ़े के पास एक पुराना बिस्तर, कुछ एल्युमीनियम के बर्तन, एक प्लास्टिक की बाल्टी और एक मग आदि के अलावा शायद ही कोई सामान था।

डमरू बजा, बारिश शुरू हो गई - प्रेरक कहानी

सहज विनोद भाव में बोलीं: प्रभु,आप भी अगर बारह वर्षों के बाद डमरू बजाना भूल गये तो?..

मैं सावंरे की कुदरत से हैरान हूँ - प्रेरक कहानी

वृंदावन शहर में एक वैघ थे, जिनका मकान भी बहुत पुराना था। वैघ साहब अपनी पत्नी को कहते कि जो तुम्हें चाहिए एक चिठ्ठी में लिख दो दुकान पर आकर पहले वह चिठ्ठी खोलते।

मीरा की भक्ति ! जब श्री कृष्ण ने अपना श्रृंगार बदला - सत्य कथा

भक्तमाल कथा: मीरा की भक्ति - जब श्री कृष्ण ने अपना श्रृंगार बदला | जीव गोसांई वृंदावन में वैष्णव-संप्रदाय के मुखिया थे। मीरा जीव गोसांई के दर्शन करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने मीरा बाई से मिलने से मना कर दिया।

Ganesh Aarti Bhajan - Ganesh Aarti Bhajan
Shri Krishna Bhajan - Shri Krishna Bhajan
Bhakti Bharat APP