भक्तमाल | तुकाराम
असली नाम – तुकाराम बोल्होबा आंबिले
अन्य नाम – तुका, तुकोबा, तुकोबाराय
गुरु - बाबाजी चैतन्य
शिष्य -
बहिणाबाई
आराध्य - विठोबा
जन्म - 21 जनवरी 1608
जन्म स्थान - देहू, पुणे, महाराष्ट्र, भारत
मृत्यु - 19 मार्च 1650 (उम्र 42 साल), देहू
वैवाहिक स्थिति: विवाहित
पिता - बोल्होबा मोरे
माता - कनकबाई मोरे
प्रसिद्ध नाम: संत तुकाराम
प्रमुख रचनाएँ - अभंग (भक्तिपूर्ण कविताएँ), तुकाराम गाथा
संत तुकाराम पश्चिमी भारत में भक्ति आंदोलन के एक सम्मानित मराठी संत, कवि और प्रमुख व्यक्ति थे। वे खास तौर पर विठोबा को समर्पित अपने भक्तिपूर्ण पदों, जिन्हें 'अभंग' कहा जाता है, के लिए जाने जाते हैं।
उन्हें मराठी साहित्य के सबसे महान संतों में से एक माना जाता है। उनकी कविताओं में कर्मकांड के बजाय भक्ति, समानता, करुणा और ईश्वर के साथ सीधे संबंध पर ज़ोर दिया गया है। उनकी रचनाएँ आज भी पूरे महाराष्ट्र और उसके बाहर गाई और पढ़ी जाती हैं। वे वारकरी परंपरा के एक केंद्रीय व्यक्ति हैं, जिसके अनुयायी पंढरपुर की तीर्थयात्रा करते हैं।
तुकाराम की शिक्षाओं का एक प्रसिद्ध विचार यह है कि सामाजिक स्थिति या बाहरी धार्मिक रीति-रिवाजों की तुलना में सच्ची भक्ति और नैतिक जीवन कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
भक्ति आंदोलन पर संत तुकाराम का प्रभाव
तुकाराम भक्ति आंदोलन के सबसे प्रभावशाली संतों में से एक बने। उन्होंने अपनी शिक्षाओं और गीतों के माध्यम से अनगिनत भक्तों को प्रेरित किया। उनका संदेश जाति और सामाजिक भेदभाव से ऊपर था; उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सच्ची भक्ति हर किसी के लिए उपलब्ध है।
तुकाराम का प्रसिद्ध कथन -
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