भक्तगायक | शारदा सिन्हा
उपनाम- बिहार कोकिला
जन्म- 1 अक्टूबर 1952, ग्राम हुलास, जिला सुपौल (बिहार)
देहावसान- 5 नवंबर 2024, एम्स, नई दिल्ली
माता- कस्तूरी देवी
पिता- सुखदेव नारायण सिन्हा
पति- डॉ. ब्रजकिशोर सिन्हा
बच्चे- अंशुमान सिन्हा (पुत्र) और वंदना सिन्हा (पुत्री)
परिवार- मिथिला और भोजपुरी संस्कृति से जुड़ा संस्कारवान और सुशिक्षित परिवार
गुरु- पंडित रघु झा, पंडित सीताराम हरि दांडेकर और पन्ना देवी
धार्मिक विचार- सनातन लोक-आस्था और प्रकृति-पूजा के प्रति अटूट निष्ठा, संगीत को पूजा और साधना मानना
प्रसिद्धि- छठ महापर्व के अमर गीत, मैथिली-भोजपुरी लोक संगीत, बॉलीवुड गीत ('बाबुल', 'तार बिजली') सम्मान- पद्म श्री व पद्म भूषण
शारदा सिन्हा केवल एक गायिका नहीं थीं, बल्कि पूर्वांचल और मिथिला की माटी से उपजी आस्था का साक्षात स्वर थीं। 1 अक्टूबर 1952 को सुपौल के हुलास गांव में जन्मी शारदा जी के जीवन में संगीत कभी केवल कला या करियर नहीं रहा, वह उनकी सहज पूजा थी। जब भी छठ महापर्व आता है, नदी घाटों पर ढलते और उगते सूर्य के बीच गूंजते उनके पारंपरिक गीत
केलवा के पात पर उगेलन सूरजमल और
कांच ही बांस के बहंगिया वातावरण को एक अलौकिक पवित्रता से भर देते हैं। उनकी आवाज में बनावटी चमक नहीं, बल्कि गंगा किनारे की भीगी मिट्टी और तुलसी चौरे की सोंधी खुशबू महसूस होती थी, जिसने करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था को एक निजी और भावनात्मक अनुभव बना दिया।
उनकी भक्ति साधना केवल छठ गीतों तक सीमित नहीं रही; शिव भजनों और माता के जयकारों में भी उनका समर्पण गहराई से झलकता था। महाकवि विद्यापति के रचित पद
उगना रे मोर कतय गेला गाते समय उनकी पुकार में वही बेचैनी सुनाई देती थी जो एक सच्चे भक्त की अपने ईश्वर के प्रति होती है। जब वे गाती थीं
हे छठी मैया या कबीर के निर्गुण पद, तो सुनने वाले को लगता था कि कोई मां या बहन अपने आंगन में बैठकर सीधे ईश्वर से संवाद कर रही है। सादगी भरा पहनावा, माथे पर बड़ी लाल बिंदी और हारमोनियम पर सधी हुई उंगलियां उनकी हर प्रस्तुति किसी धार्मिक अनुष्ठान जैसी पवित्र और शांत प्रतीत होती थी।
जीवन के अंतिम पड़ाव में जब वे गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं, तब भी उनके कंठ से भक्ति का प्रवाह थमा नहीं। अस्पताल के बिस्तर से जारी हुआ उनका आखिरी छठ गीत
दुखवा मिटाईं छठी मैया उनके अटूट विश्वास की अंतिम आहुति बन गया। 5 नवंबर 2024 को, संयोगवश उसी महापर्व के पहले दिन (नहाय-खाय), उन्होंने इस नश्वर संसार को अलविदा कहा, जिसकी उपासना में उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। शारदा सिन्हा भले ही सशरीर विदा हो गईं, लेकिन जब तक आकाश में सूरज उगेंगे और जब-जब छठ के अर्घ्य का जल नदियों में गिरेगा, उनकी भक्तिमयी आवाज हर घाट और हर आंगन में अमर रहेगी।