मुख्य आकर्षण - Key Highlights |
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| ◉ यहाँ के मुख्य देवता पार्थसारथी की मूंछें हैं। |
| ◉ यह मंदिर अपनी पारंपरिक मीठा पोंगल के लिए मशहूर है। |
| ◉ यह मंदिर अपनी द्रविड़ वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। |
अरुलमिगु श्री पार्थसारथीस्वामी मंदिर, जिसे पार्थसारथीस्वामी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण भारत के सबसे पुराने और सबसे सम्मानित वैष्णव मंदिरों में से एक है। यह मंदिर चेन्नई के ट्रिपलिकेन (तिरुवल्लिकेनी) इलाके में स्थित है। यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है, जिन्हें 'पार्थसारथी' (महाभारत में अर्जुन के सारथी) के रूप में पूजा जाता है। यह 108 'दिव्य देशों' (विष्णु के पवित्र मंदिरों) में से एक है, जिनकी प्रशंसा अलवर संतों ने की है।
अरुलमिगु श्री पार्थसारथीस्वामी मंदिर में दर्शन का समय
अरुलमिगु श्री पार्थसारथीस्वामी मंदिर पूरे हफ़्ते खुला रहता है और दर्शन का समय सुबह 6:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक फिर सुबह 4 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है।
अरुलमिगु श्री पार्थसारथीस्वामी मंदिर के मुख्य त्योहार
कृष्ण जन्माष्टमी यहाँ का मुख्य त्योहार है। इसके अलावा वैकुंठ एकादशी, ब्रह्मोत्सवम, पंगुनी सेर्थी उत्सवम, रामानुज उत्सवम और थेप्पोत्सवम जैसे त्योहार भी बहुत धूमधाम से मनाए जाते हैं। यह मंदिर अपने पारंपरिक सरकारई पोंगल (मीठा पोंगल) प्रसाद के लिए मशहूर है।
अरुलमिगु श्री पार्थसारथीस्वामी मंदिर कैसे पहुँचें
अरुलमिगु श्री पार्थसारथीस्वामी मंदिर कार स्ट्रीट, ट्रिपलिकेन, चेन्नई, तमिलनाडु में स्थित है। ट्रिपलिकेन चेन्नई के MTC बस नेटवर्क से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। सबसे नज़दीकी MRTS स्टेशन: तिरुवल्लिकेनी (ट्रिपलिकेन) MRTS स्टेशन, जो मंदिर से पैदल 5-10 मिनट की दूरी पर है। सबसे नज़दीकी मेट्रो स्टेशन गवर्नमेंट एस्टेट मेट्रो स्टेशन है। सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट है।
श्री पार्थसारथीस्वामी मंदिर का निर्माण द्रविड़ वास्तुकला शैली में किया गया है, जिसमें शानदार गोपुरम, खंभों वाले हॉल और बारीक नक्काशीदार मूर्तियां हैं। यहाँ भगवान कृष्ण की पूजा पार्थसारथी (अर्जुन के दिव्य सारथी) के रूप में और श्री वेदवल्ली थायर (लक्ष्मी) की पूजा उनकी पत्नी के रूप में की जाती है। मुख्य देवता की मूंछें हैं, जो एक योद्धा और सारथी के रूप में भगवान कृष्ण की भूमिका को दर्शाती हैं। पार्थसारथी की मूर्ति युद्ध के निशानों के लिए जानी जाती है, जो कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान अर्जुन की रक्षा करते समय कृष्ण को लगे घावों का प्रतीक है।
मूल रूप से इस मंदिर का निर्माण 6वीं शताब्दी ईस्वी में पल्लव राजाओं ने करवाया था और बाद में चोल और विजयनगर शासकों ने इसका विस्तार किया। इस मंदिर में भगवान विष्णु के पांच मुख्य रूपों की पूजा होती है: पार्थसारथी (कृष्ण), योग नरसिंह, रंगनाथ, राम और गजेंद्र वरदार।
यह मंदिर श्री वैष्णववाद का एक प्रमुख केंद्र है और यहाँ पे अलवर, तिरुमझिसाई अलवर और तिरुमंगई अलवर जैसे संतों ने पूजा-अर्चना की है। यह मंदिर आज भी उन भक्तों को आकर्षित करता है जो साहस, ज्ञान और धर्मपूर्ण जीवन के लिए भगवान कृष्ण का आशीर्वाद चाहते हैं।
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