एक साँप को एक बाज अपने पंजों में दबाकर आसमान में उड़ाकर ले जा रहा था।
अचानक साँप बाज के पंजों से छूट गया और एक कुएँ में जा गिरा। बाज ने उसे पकड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन अंत में थक-हारकर वहाँ से चला गया।
साँप ने देखा कि कुएँ में बड़े-बड़े, किंग साइज़ के मेंढक मौजूद थे। पहले तो वह डर गया, फिर एक सूखे चबूतरे पर जाकर बैठ गया और मेंढकों के प्रधान को खोजने लगा।
आखिरकार, उसने एक मेंढक को बुलाया और कहा-
मैं एक ज़हरीला साँप हूँ। मेरा ज़हर तुम सबकी जान ले सकता है। अगर तुम लोग अपनी जान बचाना चाहते हो, तो रोज़ एक मेंढक मेरे पास भेज दिया करो। वह मेरी सेवा करेगा और बदले में मैं तुम सबको सुरक्षित रहने दूँगा। इस तरह तुम सब आराम से रह सकोगे।
उसने आगे कहा- लेकिन याद रखना, हर दिन एक मेंढक मेरे पास आना चाहिए।
अपनी जान बचाने के लालच में मेंढकों ने उसकी बात मान ली।
अब हर दिन एक मेंढक साँप के पास भेजा जाने लगा और साँप उसे खा जाता।
इस तरह एक-एक करके साँप सारे मेंढकों को निगल गया।
जब केवल मेंढकों का प्रधान ही बचा, तब साँप चबूतरे से उतरकर पानी में आया और बोला- प्रधान जी, आज आपकी बारी है!
प्रधान मेंढक ने हैरानी से कहा-
तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया? मैंने तो तुम्हारी मदद की थी!
साँप ने जवाब दिया-
जो दूसरों के साथ विश्वासघात करता है, उसे एक दिन अपने कर्मों का फल अवश्य ही मिलता है।
इतना कहकर साँप ने प्रधान मेंढक को भी निगल लिया।
कुछ देर बाद साँप धीरे-धीरे कुएँ से बाहर निकला और चबूतरे पर आकर आराम करने लगा।
तभी अचानक एक बाज आया और उसने साँप को अपने पंजों में दबोच लिया।
बाज ने कहा- पहचाना मुझे, साँप? मैं वही बाज हूँ, जिसके बच्चों को तुमने पिछले साल खा लिया था। जब मैं तुम्हें पकड़कर ले जा रहा था, तब तुम मेरे पंजों से छूटकर इसी कुएँ में गिर गए थे।
बाज ने आगे कहा- उस दिन से मैं लगातार तुम्हारी हरकतों पर नज़र रख रहा था। आज तुम सारे मेंढकों को खाकर बहुत मोटे हो गए हो। मेरे बच्चे अब बड़े हो रहे हैं। वे तुम्हें जिंदा नोच-नोचकर अपने भाई-बहनों की मौत का बदला लेंगे।
इतना कहकर बाज साँप को अपने पंजों में दबोचकर अपने घोंसले की ओर उड़ गया।
विश्वासघात का अंजाम
बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, उसका अंत एक दिन निश्चित है। दूसरों के साथ किया गया विश्वासघात और बुरे कर्म अंततः करने वाले के पास लौटकर आते हैं।