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रक्षाबंधन कथा (Raksha Bandhan Katha)


रक्षाबंधन कथा
भगवान इंद्र और उनकी पत्नी शची की कहानी:
रक्षाबंधन की अनेक कथाएँ प्रचलित हैं, लेकिन भविष्य पुराण में वर्णित कथा सबसे प्रामाणिक है। रक्षाबंधन के पीछे व्रतराज में भी भविष्य पुराण की कथा का उल्लेख मिलता है।

युगों पूर्व, देवताओं और दानवों के बीच भीषण युद्ध हुआ था। यह भीषण युद्ध बारह वर्षों तक चला। अंततः देवता युद्ध हार गए और दानवों ने इंद्र के राज्य सहित तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली।

देवों के देव, इंद्र ने देवताओं के गुरु बृहस्पति से परामर्श किया। गुरु बृहस्पति ने इंद्र को रक्षा विधान और उसे करने का मंत्र सुझाया।

श्रावण पूर्णिमा के दिन गुरु ने रक्षा विधान का अनुष्ठान किया। रक्षा विधान के दौरान, रक्षा पोटली को पवित्र मंत्र से दृढ़ किया गया। पूजा के बाद, इंद्र की पत्नी शुचि ने इंद्र के दाहिने हाथ में रक्षा पोटली बाँधी।

रक्षा पोटली की शक्ति के कारण, इंद्र दानवों को पराजित करने और अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने में सक्षम हुए। तब से रक्षाबंधन की रस्म श्रावण पूर्णिमा के दौरान निभाई जाती है।

Raksha Bandhan Katha in English

Although there are various legends of Raksha Bandhan, but the legend mentioned in Bhavishya Purana is the most authenticated one. The legend of Bhavishya Purana is also mentioned in Vratraj behind the ritual of Raksha Bandhan.
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