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उपहार का मूल्य - प्रेरक कहानी (Value of Gift)


उपहार का मूल्य - प्रेरक कहानी
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प्राचीन समय की बात है, एक घने जंगल में एक पहुंचे हुए महात्मा रहा करते थे। उनके कई शिष्यों में से तीन शिष्य उनके हृदय के बहुत करीब थे। उन तीनों में एक बात का बड़ा अंतर था कीर्तिमान और कार्तिकेय दो शिष्य अत्यंत निर्धन थे, जो भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करते थे, जबकि तीसरा शिष्य समस एक बहुत बड़े नगर का प्रतिष्ठित और धनी व्यापारी था।
एक बार गुरु जी ने अपनी कुटिया की मरम्मत और आश्रम में भंडारे के लिए कुछ सहायता मांगी। उन्होंने तीनों शिष्यों को बुलाया और अपनी इच्छा प्रकट की।

धन का अहंकार और सादगी का भाव - Arrogance, Wealth and The Spirit of Simplicity
अमीर शिष्य समस ने तुरंत अपनी रेशमी थैली निकाली और गुरु जी के चरणों में स्वर्ण मुद्राओं का ढेर लगा दिया। उसने गर्व से कहा, गुरुदेव, आप चिंता न करें। मेरे पास इतना धन है कि मैं अकेले ही इस पूरे आश्रम को महल जैसा बनवा सकता हूँ। गुरु जी मुस्कुराए, लेकिन कुछ बोले नहीं।

दूसरी ओर, दोनों कीर्तिमान और कार्तिकेय उदास हो गए। उनके पास देने के लिए न स्वर्ण मुद्राएं थीं और न ही कीमती उपहार। वे गुरु जी को कुछ न दे पाने के दुःख में रात भर सो नहीं सके।

प्रेम की खोज - Search for Love
अगले दिन, दोनों शिष्यों ने तय किया कि वे अपनी मेहनत से कुछ लेकर आएंगे। कीर्तिमान पूरे दिन जंगल में घूमकर सूखी लकड़ियाँ बीनता रहा ताकि आश्रम की रसोई चलती रहे। वहीं कार्तिकेय दूर पहाड़ों से शुद्ध झरनों का जल और कुछ जंगली फल चुनकर लाया।

शाम को जब वे दोनों आश्रम लौटे, तो अमीर शिष्य उनका मज़ाक उड़ाने लगा। उसने कहा, गुरु जी को इन पत्थरों और लकड़ियों की क्या ज़रूरत? मैंने तो उन्हें सोने की मोहरें दी हैं।

गुरु की सीख - Guru`s Teachings
गुरु जी ने तीनों को बुलाया और कहा, आज मैं तुम तीनों के उपहारों का मूल्य बताऊंगा। उन्होंने अमीर शिष्य की स्वर्ण मुद्राओं को एक तरफ रखा और गरीब शिष्यों द्वारा लाई गई लकड़ियों और फलों को दूसरी तरफ।

गुरु जी बोले, पुत्र समस, तुमने धन तो बहुत दिया, लेकिन उस धन के साथ तुम्हारा अहंकार भी आया है। तुमने यह सोचकर दान दिया कि तुम मुझ पर उपकार कर रहे हो। लेकिन इन दोनों ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर परिश्रम किया है। इनकी लकड़ियों में इनकी मेहनत का पसीना है और इन फलों में निस्वार्थ प्रेम।
अचानक, अमीर शिष्य समस ने देखा कि उसकी स्वर्ण मुद्राएं मिट्टी जैसी बेजान लग रही थीं, जबकि गरीब शिष्यों के लाए हुए फल और जल से पूरी कुटिया महक रही थी। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया।

कहानी की शिक्षा - Moral of the Story
◉ श्रद्धा धन की मोहताज नहीं होती ईश्वर या गुरु को हमारे धन की आवश्यकता नहीं होती, वे केवल हमारे मन के भाव और समर्पण को देखते हैं।
◉ अहंकार दान को नष्ट कर देता है यदि दान देने के बाद मन में गर्व आ जाए, तो उस दान का पुण्य समाप्त हो जाता है।
◉ मेहनत का मूल्य अपनी मेहनत से अर्जित की गई छोटी सी वस्तु भी अहंकार में दिए गए स्वर्ण से कहीं अधिक मूल्यवान होती है।
यह भी जानें

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