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अमृत बेला गया आलसी सो रहा बन आभागा !


बेला अमृत गया, आलसी सो रहा, बन आभागा,
साथी सारे जगे, तू न जागा,
बेला अमृत गया, आलसी सो रहा, बन आभागा,
साथी सारे जगे, तू न जागा,

झोलियाँ भर रहै भाग्य वाले, लाख पतितो ने जीवन सम्भाले,
रंक राजा बने, प्रभु रस में सने, कष्ट भागा,
साथी सारे जगे, तू न जागा,
॥ बेला अमृत गया...॥

प्रभु कृपा से नर तन यह पाया, आलसी बनकर यूँ ही गँवाया
उल्टी हो गई मती, कर ली अपनी छती, चोला त्यागा,
साथी सारे जगे, तू न जागा,
॥ बेला अमृत गया...॥

स्वास एक एक अनमोल बीता, अमृत के बदले विष को तू पीता,
सौदा घाटे का कर, हाथ माथे पे धर, रोने लगा,
साथी सारे जगे, तू न जागा,
॥ बेला अमृत गया...॥

मानव कुछ भी न तूने बिचारा , सिर से ऋषियो का ऋण न उतारा,
गुरु का नाम न लिया, गंदा पानी पीया, बन के कागा,
साथी सारे जगे, तू न जागा,
॥ बेला अमृत गया...॥

बेला अमृत गया, आलसी सो रहा, बन आभागा,
साथी सारे जगे, तू न जागा,

BhajanVedic BhajanVed BhajanArya Samaj BhajanGuru Bhajan


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