॥ बहुचर माँ की आरती ॥
खम्मा खम्मा रे बहुचर मात
माड़ी हूँ तो प्रेमे उतारूँ तारी आरती।
बाला स्वरूपे तारो वास,
माड़ी हूँ तो प्रेमे उतारूँ तारी आरती॥
खम्मा खम्मा रे बहुचर मात
माड़ी हूँ तो प्रेमे उतारूँ तारी आरती॥
हो….. बहुचर माँ….. जय हो तारो बहुचर माँ…..
दरिया जेवी माड़ी तारो महिमा अपरंपार,
तारो पालव पकड़े एनो पल माँ बेड़ो पार।
तारा शरण नो हूँ तो दास,
माड़ी हूँ तो प्रेमे उतारूँ तारी आरती॥
खम्मा खम्मा रे बहुचर मात
माड़ी हूँ तो प्रेमे उतारूँ तारी आरती॥
निर्धन ने तू वैभव देती, देती सुख भंडार,
वंश तणी तू वेल वधारे, पुत्र अने परिवार।
सौना मनडानी पूरे आश,
माड़ी हूँ तो प्रेमे उतारूँ तारी आरती॥
Bhaktibharat Lyrics
खम्मा खम्मा रे बहुचर मात
माड़ी हूँ तो प्रेमे उतारूँ तारी आरती॥
माड़ी तारा दर्शन करता पापी पावन थाय,
माड़ी तारी भक्ति करता आनंद मंगल थाय।
हे, भक्तो ने पाको विश्वास,
माड़ी हूँ तो प्रेमे उतारूँ तारी आरती॥
खम्मा खम्मा रे बहुचर मात
माड़ी हूँ तो प्रेमे उतारूँ तारी आरती॥