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आपस की फूट, जगत की लूट - प्रेरक कहानी (Apas Ki Foot, Jagat Ki Loot)


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सन 1612 की बात है। जेठ की तपती दोपहर थी। कलकत्ता के एक व्यस्त बाजार में ईस्ट इंडिया कंपनी का एक अंग्रेज कर्मचारी घूम रहा था। चारों ओर चहल-पहल थी। तभी उसकी नजर मिट्टी के बर्तनों की एक दुकान पर पड़ी, जहाँ लोगों की काफी भीड़ लगी थी।
जिज्ञासावश वह दुकान पर पहुँचा और बूढ़े दुकानदार से पूछा,
“यह बर्तन क्या है और लोग इसे इतनी संख्या में क्यों खरीद रहे हैं?”

बूढ़ा दुकानदार मुस्कुराकर बोला,
“साहब, इसे घड़ा कहते हैं। इसमें पानी रखने से पानी ठंडा रहता है।”

अंग्रेज ने एक घड़ा खरीदा और आगे बढ़ गया।

कुछ दूर उसे दूसरी दुकान पर भीड़ दिखाई दी। वहाँ भी मिट्टी के सुंदर बर्तन बिक रहे थे। उसने देखा कि एक बर्तन की गर्दन लंबी और मुँह छोटा था।

उसने दुकानदार से पूछा,
“इसे क्या कहते हैं?”

दुकानदार बोला,
“साहब, इसे सुराही कहते हैं। इसमें पानी घड़े से भी ज्यादा ठंडा रहता है।”

फिर वह थोड़ा मुस्कुराकर बोला,
“आपने मेरे पिताजी की दुकान से घड़ा खरीद लिया, जबकि मैं उसी कीमत में आपको सुराही दे सकता था। मेरे पिताजी की आदत ही ऐसी है, ग्राहक को पहले ही रोक लेते हैं। उन्हें यह बताना पसंद नहीं कि मेरा बर्तन ज्यादा अच्छा है।”

अंग्रेज ने एक सुराही खरीदी और आगे चल पड़ा।

थोड़ी दूर जाने पर उसे तीसरी दुकान दिखाई दी। वहाँ एक नौजवान मिट्टी के कुछ अलग प्रकार के बर्तन बेच रहा था। अंग्रेज ने एक छोटा-सा बर्तन उठाया, जिसके किनारे पर पतली टोंटी लगी हुई थी।

उसने पूछा,
“यह क्या है?”

नौजवान ने गर्व से कहा,
“साहब, इसे तुम्बा कहते हैं। आपने मेरे पिता से घड़ा और भाई से सुराही खरीदी है, लेकिन दोनों से पानी डालते समय पानी ज्यादा गिरता है। मेरे इस तुम्बे में टोंटी लगी है, इसलिए पानी बिल्कुल कम बर्बाद होता है।”

फिर उसने धीरे से कहा,
“लेकिन मेरे पिता और भाई मेरी चीज की तारीफ नहीं करते। वे दोनों मुझसे ईर्ष्या करते हैं और ग्राहक को मेरी खासियत बताते ही नहीं।”

अंग्रेज ने वह तुम्बा भी खरीद लिया।

इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन वह मुस्कान पहले जैसी नहीं थी। उसमें एक कुटिल योजना की झलक थी।

अगली सुबह वह तीनों बर्तन लेकर अपने कैप्टन के पास पहुँचा।

कैप्टन ने पूछा,
“ये क्या लेकर आए हो?”

अंग्रेज कर्मचारी ने कहा,
“सर, ये पानी ठंडा रखने के बर्तन हैं। लेकिन इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण बात मैंने इनके पीछे छिपी है।”

उसने पूरी घटना कैप्टन को बता दी और अंत में कहा,

“सर, भारत केवल धनवान ही नहीं है, बल्कि यहाँ के लोग अत्यंत प्रतिभाशाली और हुनरमंद हैं। लेकिन मैंने एक और चीज देखी है—इनमें आपसी अहंकार और ईर्ष्या भी बहुत है।”

कैप्टन ध्यान से सुन रहा था।

अंग्रेज बोला,
“एक ही परिवार के तीन लोग अलग-अलग बर्तन बनाते हैं। तीनों में हुनर है, लेकिन एक-दूसरे की अच्छाई स्वीकार करने के बजाय वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं। यदि एक की थोड़ी तारीफ कर दी जाए तो वह दूसरे से अलग हो जाएगा। अगर उनमें छोटी-सी बात को लेकर मतभेद पैदा कर दिया जाए, तो वे स्वयं ही एक-दूसरे के विरोधी बन जाएंगे।”

कैप्टन की आँखों में चमक आ गई।

अंग्रेज ने आगे कहा,

“सर, यदि यही स्थिति पूरे देश में है, तो सोचिए—राजाओं में कितनी प्रतिद्वंद्विता होगी, रियासतों में कितनी फूट होगी और पड़ोसी एक-दूसरे से कितने ईर्ष्यालु होंगे। हमें उन्हें हराने के लिए हमेशा बड़ी सेना की आवश्यकता नहीं होगी। हम उनकी फूट को ही अपना हथियार बना सकते हैं।”

कैप्टन ने मेज पर हाथ मारा और कहा,
“यही तो हमारी सबसे बड़ी ताकत होगी—उन्हें आपस में बाँटो और फिर एक-एक करके उन पर अधिकार करो।”

योजना बनाई गई।

किसी को पद का लालच दिया गया, किसी को सम्मान का। किसी के कान में दूसरे के खिलाफ बातें डाली गईं, तो किसी को यह विश्वास दिलाया गया कि उसका पड़ोसी उसके अधिकार छीन रहा है।

धीरे-धीरे अविश्वास बढ़ता गया।

जहाँ एकता होनी चाहिए थी, वहाँ प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी गई। जहाँ भाईचारा होना चाहिए था, वहाँ स्वार्थ आ गया।

और इतिहास ने हमें एक बड़ी सीख दी—

जब अपनों की कमजोरी, अपनों के खिलाफ इस्तेमाल होने लगे, तब बाहरी दुश्मन को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती।

इसलिए जीवन में हमेशा याद रखिए—

आपकी सबसे बड़ी ताकत आपकी संपत्ति नहीं, आपकी एकता है।

दूसरे की सफलता देखकर जलने के बजाय उसका सम्मान कीजिए। किसी की कमी देखकर उसे नीचा दिखाने के बजाय उसका हाथ पकड़िए। क्योंकि जब हम एक-दूसरे को गिराने में लग जाते हैं, तब कोई तीसरा व्यक्ति हमें आसानी से अपने हित के लिए इस्तेमाल कर सकता है।

फूट चाहे परिवार में हो, समाज में हो या राष्ट्र में—उसका लाभ हमेशा कोई तीसरा उठाता है।

इसलिए—आपस में प्रेम रखिए,
एक-दूसरे की प्रतिभा का सम्मान कीजिए,
ईर्ष्या को त्यागिए और एकता को मजबूत कीजिए।

क्योंकि सच यही है—“आपस की फूट, जगत की लूट।”
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