
तृष्णाच्छेदकरी तृप्ता तीक्ष्णा तीक्ष्णस्वरूपिणी।
तुला तुलादिरहिता तत्तद्ब्रह्मस्वरूपिणी॥ १२२॥
त्राणकर्त्री त्रिपापघ्नी त्रिपदा त्रिदशान्विता।
तथ्या त्रिशक्तिस्त्रिपदा तुर्या त्रैलोक्यसुन्दरी॥ १२३॥
तेजस्करी त्रिमूर्त्याद्या तेजोरूपा त्रिधामता।
त्रिचक्रकर्त्री त्रिभगा तुर्यातीतफलप्रदा॥ १२४॥
तेजस्विनी तापहारी तापोपप्लवनाशिनी।
तेजोगर्भा तपःसारा त्रिपुरारिप्रियंकरी॥ १२५॥
तन्वी तापससंतुष्टा तपनाङ्गजभीतिनुत्।
त्रिलोचना त्रिमार्गा च तृतीया त्रिदशस्तुता॥ १२६॥
त्रिसुन्दरी त्रिपथगा तुरीयपददायिनी।
शुभा शुभावती शान्ता शान्तिदा शुभदायिनी॥ १२७॥
शीतळा शूलिनी शीता श्रीमती च शुभान्विता।
योगसिद्धिप्रदा योग्या यज्ञेनपरिपूरिता॥ १२८॥
यज्या यज्ञमयी यक्षी यक्षिणी यक्षिवल्लभा।
यज्ञप्रिया यज्ञपूज्या यज्ञतुष्टा यमस्तुता॥ १२९॥
यामिनीयप्रभा याम्या यजनीया यशस्करी।
यज्ञकर्त्री यज्ञरूपा यशोदा यज्ञसंस्तुता॥ १३०॥
यज्ञेशी यज्ञफलदा योगयोनिर्यजुस्तुता।
यमिसेव्या यमाराध्या यमिपूज्या यमीश्वरी॥ १३१॥
योगिनी योगरूपा च योगकर्तृप्रियंकरी।
योगयुक्ता योगमयी योगयोगीश्वराम्बिका॥ १३२॥
योगज्ञानमयी योनिर्यमाद्यष्टाङ्गयोगता।
यन्त्रिताघौघसंहारा यमलोकनिवारिणी॥ १३३॥
यष्टिव्यष्टीशसंस्तुत्या यमाद्यष्टाङ्गयोगयुक्।
योगीश्वरी योगमाता योगसिद्धा च योगदा॥ १३४॥
योगारूढा योगमयी योगरूपा यवीयसी।
यन्त्ररूपा च यन्त्रस्था यन्त्रपूज्या च यन्त्रिता॥ १३५॥
युगकर्त्री युगमयी युगधर्मविवर्जिता।
यमुना यमिनी याम्या यमुनाजलमध्यगा॥ १३६॥
यातायातप्रशमनी यातनानान्निकृन्तनी।
योगावासा योगिवन्द्या यत्तच्छब्दस्वरूपिणी॥ १३७॥
योगक्षेममयी यन्त्रा यावदक्षरमातृका।
यावत्पदमयी यावच्छब्दरूपा यथेश्वरी॥ १३८॥
यत्तदीया यक्षवन्द्या यद्विद्या यतिसंस्तुता।
यावद्विद्यामयी यावद्विद्याबृन्दसुवन्दिता॥ १३९॥
योगिहृत्पद्मनिलया योगिवर्यप्रियंकरी।
योगिवन्द्या योगिमाता योगीशफलदायिनी॥ १४०॥
यक्षवन्द्या यक्षपूज्या यक्षराजसुपूजिता।
यज्ञरूपा यज्ञतुष्टा यायजूकस्वरूपिणी॥ १४१॥
यन्त्राराध्या यन्त्रमध्या यन्त्रकर्तृप्रियंकरी।
यन्त्रारूढा यन्त्रपूज्या योगिध्यानपरायणा॥ १४२॥
यजनीया यमस्तुत्या योगयुक्ता यशस्करी।
योगबद्धा यतिस्तुत्या योगज्ञा योगनायकी॥ १४३॥
योगिज्ञानप्रदा यक्षी यमबाधाविनाशिनी।
योगिकाम्यप्रदात्री च योगिमोक्षप्रदायिनी॥ १४४॥
इति नाम्नां सरस्वत्याः सहस्रं समुदीरितम्।
मन्त्रात्मकं महागोप्यं महासारस्वतप्रदम्॥ १॥
यः पठेच्छृणुयाद्भक्त्या त्रिकालं साधकः पुमान्।
सर्वविद्यानिधिः साक्षात् स एव भवति ध्रुवम्॥ २॥
लभते संपदः सर्वाः पुत्रपौत्रादिसंयुताः।
मूकोपि सर्वविद्यासु चतुर्मुख इवापरः॥ ३॥
भूत्वा प्राप्नोति सान्निध्यं अन्ते धातुर्मुनीश्वर।
सर्वमन्त्रमयं सर्वविद्यामानफलप्रदम्॥ ४॥
महाकवित्वदं पुंसां महासिद्धिप्रदायकम्।
कस्मैचिन्न प्रदातव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि॥ ५॥
महारहस्यं सततं वाणीनामसहस्रकम्।
सुसिद्धमस्मदादीनां स्तोत्रं ते समुदीरितम्॥ ६॥
॥ इति श्रीस्कान्दपुराणान्तर्गत
सनत्कुमार संहितायां नारद सनत्कुमार संवादे
सरस्वतीसहस्रनामस्तोत्रम् सम्पूर्णम्॥
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