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श्री वेंकटेश्वर सुप्रभातम् - M.S.सुब्बुलक्ष्मी (Sri Venkateswara Suprabhatam By M.S.Subbulakshmi)


श्री वेंकटेश्वर सुप्रभातम् - M.S.सुब्बुलक्ष्मी
श्री वेंकटेश्वर सुप्रभातम सबसे प्रसिद्ध हिंदू भक्ति भजनों में से एक है, जो तिरुपति के तिरुमाला में भगवान वेंकटेश्वर को जगाने के लिए सुबह-सुबह गाया जाता है।
इसे भारत रत्न एमएस शुभलक्ष्मी ने गाया था। यह भजन पारंपरिक रूप से तिरुमाला तिरुपति मंदिर में हर सुबह प्रथम दर्शन से पहले गाया जाता है।

श्री वेंकटेश्वर सुप्रभातम्

कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वासंध्या प्रवर्तते ।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥ 1 ॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद उत्तिष्ठ गरुडध्वज ।
उत्तिष्ठ कमलाकांत त्रैलोक्यं मंगलं कुरु ॥ 2 ॥

मातस्समस्त जगतां मधुकैटभारेः
वक्षोविहारिणि मनोहर दिव्यमूर्ते ।
श्रीस्वामिनि श्रितजनप्रिय दानशीले
श्री वेंकटेश दयिते तव सुप्रभातम् ॥ 3 ॥

तव सुप्रभातमरविंद लोचने
भवतु प्रसन्नमुख चंद्रमंडले ।
विधि शंकरेंद्र वनिताभिरर्चिते
वृश शैलनाथ दयिते दयानिधे ॥ 4 ॥

अत्र्यादि सप्त ऋषयस्समुपास्य संध्यां
आकाश सिंधु कमलानि मनोहराणि ।
आदाय पादयुग मर्चयितुं प्रपन्नाः
शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ 5 ॥

पंचाननाब्ज भव षण्मुख वासवाद्याः
त्रैविक्रमादि चरितं विबुधाः स्तुवंति ।
भाषापतिः पठति वासर शुद्धि मारात्
शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ 6 ॥

ईशत्-प्रफुल्ल सरसीरुह नारिकेल
पूगद्रुमादि सुमनोहर पालिकानाम् ।
आवाति मंदमनिलः सहदिव्य गंधैः
शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ 7 ॥

उन्मील्यनेत्र युगमुत्तम पंजरस्थाः
पात्रावसिष्ट कदली फल पायसानि ।
भुक्त्वाः सलील मथकेलि शुकाः पठंति
शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ 8 ॥

तंत्री प्रकर्ष मधुर स्वनया विपंच्या
गायत्यनंत चरितं तव नारदोऽपि ।
भाषा समग्र मसत्-कृतचारु रम्यं
शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ 9 ॥

भृंगावली च मकरंद रसानु विद्ध
झुंकारगीत निनदैः सहसेवनाय ।
निर्यात्युपांत सरसी कमलोदरेभ्यः
शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ 10 ॥

योषागणेन वरदध्नि विमथ्यमाने
घोषालयेषु दधिमंथन तीव्रघोषाः ।
रोषात्कलिं विदधते ककुभश्च कुंभाः
शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ 11 ॥

पद्मेशमित्र शतपत्र गतालिवर्गाः
हर्तुं श्रियं कुवलयस्य निजांगलक्ष्म्याः ।
भेरी निनादमिव भिभ्रति तीव्रनादम्
शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ 12 ॥

श्रीमन्नभीष्ट वरदाखिल लोक बंधो
श्री श्रीनिवास जगदेक दयैक सिंधो ।
श्री देवता गृह भुजांतर दिव्यमूर्ते
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 13 ॥

श्री स्वामि पुष्करिणिकाप्लव निर्मलांगाः
श्रेयार्थिनो हरविरिंचि सनंदनाद्याः ।
द्वारे वसंति वरनेत्र हतोत्त मांगाः
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 14 ॥

श्री शेषशैल गरुडाचल वेंकटाद्रि
नारायणाद्रि वृषभाद्रि वृषाद्रि मुख्याम् ।
आख्यां त्वदीय वसते रनिशं वदंति
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 15 ॥

सेवापराः शिव सुरेश कृशानुधर्म
रक्षोंबुनाथ पवमान धनाधि नाथाः ।
बद्धांजलि प्रविलसन्निज शीर्षदेशाः
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 16 ॥

धाटीषु ते विहगराज मृगाधिराज
नागाधिराज गजराज हयाधिराजाः ।
स्वस्वाधिकार महिमाधिक मर्थयंते
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 17 ॥

सूर्येंदु भौम बुधवाक्पति काव्यशौरि
स्वर्भानुकेतु दिविशत्-परिशत्-प्रधानाः ।
त्वद्दासदास चरमावधि दासदासाः
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 18 ॥

तत्-पादधूलि भरित स्फुरितोत्तमांगाः
स्वर्गापवर्ग निरपेक्ष निजांतरंगाः ।
कल्पागमा कलनयाऽऽकुलतां लभंते
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 19 ॥

त्वद्गोपुराग्र शिखराणि निरीक्षमाणाः
स्वर्गापवर्ग पदवीं परमां श्रयंतः ।
मर्त्या मनुष्य भुवने मतिमाश्रयंते
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 20 ॥

श्री भूमिनायक दयादि गुणामृताब्दे
देवादिदेव जगदेक शरण्यमूर्ते ।
श्रीमन्ननंत गरुडादिभि रर्चितांघ्रे
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 21 ॥

श्री पद्मनाभ पुरुषोत्तम वासुदेव
वैकुंठ माधव जनार्धन चक्रपाणे ।
श्री वत्स चिह्न शरणागत पारिजात
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 22 ॥

कंदर्प दर्प हर सुंदर दिव्य मूर्ते
कांता कुचांबुरुह कुट्मल लोलदृष्टे ।
कल्याण निर्मल गुणाकर दिव्यकीर्ते
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 23 ॥

मीनाकृते कमठकोल नृसिंह वर्णिन्
स्वामिन् परश्वथ तपोधन रामचंद्र ।
शेषांशराम यदुनंदन कल्किरूप
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 24 ॥

एलालवंग घनसार सुगंधि तीर्थं
दिव्यं वियत्सरिति हेमघटेषु पूर्णम् ।
धृत्वाद्य वैदिक शिखामणयः प्रहृष्टाः
तिष्ठंति वेंकटपते तव सुप्रभातम् ॥ 25 ॥

भास्वानुदेति विकचानि सरोरुहाणि
संपूरयंति निनदैः ककुभो विहंगाः ।
श्रीवैष्णवाः सतत मर्थित मंगलास्ते
धामाश्रयंति तव वेंकट सुप्रभातम् ॥ 26 ॥

ब्रह्मादय-स्सुरवरा-स्समहर्षयस्ते
संतस्सनंदन-मुखास्त्वथ योगिवर्याः ।
धामांतिके तव हि मंगलवस्तुहस्ताः
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 27 ॥

लक्श्मीनिवास निरवद्य गुणैक सिंधो
संसारसागर समुत्तरणैक सेतो ।
वेदांत वेद्य निजवैभव भक्त भोग्य
श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ 28 ॥

इत्थं वृषाचलपतेरिह सुप्रभातं
ये मानवाः प्रतिदिनं पठितुं प्रवृत्ताः ।
तेषां प्रभात समये स्मृतिरंगभाजां
प्रज्ञां परार्थ सुलभां परमां प्रसूते ॥ 29 ॥

Sri Venkateswara Suprabhatam By M.S.Subbulakshmi in English

Kausalyā Suprajā RāMa PūRvāSandhyā Pravartatē । UttiṣṭHa NaraśāRdūLa Kartavyaṃ DaivamāHnikam ॥ 1 ॥
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