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वसिष्ठजी द्वारा सुनाई गई राजा अनरण्य की कथा ( Raja Anaranya Ki Katha)


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भगवान शिव की प्रेरणा से सप्तऋषि वसिष्ठजी ने गिरिश्रेष्ठ हिमालय को सुनाई राजा अनरण्य की यह कथा। भक्ति भारत आप तक यह कथा पहुँचा रहा है।
इन्द्रसावर्णि नामक चौदहवें मनुके वंश में मंगलारण्यका का महाबलवान् शिव भक्त पुत्र अनरण्य उत्पन्न हुआ था। वह राजराजेश्वर तथा सातों द्वीपोंका सम्राट् था। उसने महर्षि भृगुको अपना पुरोहित बनाकर एक सौ यज्ञ किये और देवताओंके द्वारा इन्द्रपद दिये जानेपर भी उसने उसे स्वीकार नहीं किया॥
हे हिमालय राज! उस राजाके सौ पुत्र उत्पन्न हुए और लक्ष्मीसदृश सुन्दर एक पद्मा नामकी कन्या उत्पन्न हुई॥ उस राजाका जो प्रेम अपने सौ पुत्रोंके प्रति था, उससे भी अधिक उस कन्या पर था। उस राजा अनरण्य की सर्वसौभाग्यशालिनी पाँच रानियाँ थीं, जो राजा को प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थीं। जिस समय वह कन्या पिता के घर में युवावस्था को प्राप्त कर रही थी, तब राजाने उसके लिये उत्तम वर प्राप्त करनेहेतु अपने दूतों को पत्र भेजा।

एक समय ऋषि पिप्पलाद जब अपने आश्रम जाने के लिये तत्पर थे, तभी तपस्या के योग्य एक निर्जन स्थान में उन्होंने काम कला में निपुण तथा स्त्री के साथ शृंगार रस के सागरमें निमग्न हो बड़े प्रेम से विहार करते हुए एक गन्धर्व को देखा। वे मुनिश्रेष्ठ उसे देखकर कामके वशीभूत हो गये और तप से चित्त हटा कर दार संग्रह की चिन्ता में पड़ गये। इस प्रकार काम से व्याकुल चित्त हुए उन श्रेष्ठ मुनि पिप्पलाद का कुछ समय बीता। एक समय जब वे मुनिश्रेष्ठ पुष्पभद्रा नदी में स्नान करने के लिये जा रहे थे, तब उन्होंने लक्ष्मी के समान मनोरम युवती पद्माको देखा। उसके बाद मुनि ने आस-पास के लोगों से पूछा कि यह किसकी कन्या है, तब शाप के भय से व्याकुल उन लोगोंने नमस्कार करके बताया।
लोग बोले- यह राजा अनरण्य की कन्या है, जो साक्षात् दूसरी लक्ष्मी के समान है, श्रेष्ठ राजागण गुणों की निधि स्वरूपा इस सुन्दरीको पानेकी इच्छा करने लगे।

हे गिरे! उसके बाद मुनि स्नान कर विधिपूर्वक अपने इष्टदेव शंकर का विधिवत् पूजन करके काम के वशीभूत हो भिक्षा के लिये अनरण्यकी सभामें गये। राजाने मुनि को देखते ही भयभीत होकर प्रणाम किया और मधुपर्कादि देकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की। पूजा ग्रहण करने के अनन्तर मुनिने कन्या की याचना की, तब राजा इस बातको सुनकर अवाक् होगया और कुछ भी कहने में समर्थ नहीं हुआ।

उन मुनि ने कन्या को माँगा और कहा - हे नृपेश्वर! तुम अपनी कन्या हमें दे दो, अन्यथा मैं क्षणभर में सब कुछ भस्म कर दूँगा।

उस समय मुनि के तेज से राजा के सब सेवक हक्के-बक्के हो गये और वृद्धावस्था से जर्जर सभी रानियोंको भी कुछ सूझ नहीं रहा था, उस विप्रको देखकर परिकरोंसहित राजा रोने लगे। कन्या की माता महारानी शोकसे व्यथित होकर मूर्च्छित हो गयीं, राजा के सभी पुत्र भी शोकसे आकुल-चित्तवाले हो गये।

इस प्रकार राजाके सभी सगे-सम्बन्धी शोकसे व्याकुल हो गये। इसी समय महापण्डित, बुद्धिमान् तथा सर्वोत्तम गुरु एवं पुरोहित ब्राह्मण-दोनों राजाके समीप आये तब राजाके नीतिशास्त्रज्ञ पण्डित गुरु तथा ब्राह्मण से उपाय पूछा।

पुरोहित ने राजा को तथा शोक से व्याकुल रानियों एवं राजपुत्रों तथा उस कन्याको सभी के हित कारक तथा नीतियुक्त वाक्यों से आदरपूर्वक समझाया।
गुरु तथा पुरोहित बोले - हे राजन्! आप परिवार के सहित शोक मत कीजिये और शास्त्र में अपनी बुद्धि लगाइये। आज ही अथवा एक वर्ष के बाद आपको अपनी कन्या किसी न किसी पात्र को देनी ही है, वह पात्र चाहे ब्राह्मण हो अथवा अन्य कोई हो। किंतु हम इस ब्राह्मण से बढ़कर सुन्दर पात्र इस त्रिलोकी में अन्य को नहीं देख रहे हैं, अतः आप अपनी कन्या इन मुनि को देकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति की रक्षा कीजिये।

गुरु तथा पुरोहित ने आगे कहा - हे राजन्! यदि ऐसा नहीं करेंगे तो, एक के कारण तुम्हारी सारी सम्पत्ति नष्ट हो जायगी। उस एक का त्याग कर सबकी रक्षा करो। शरणागत का त्याग नहीं करना चाहिये, चाहे उसके लिये सब कुछ नष्ट हो जाय।

वसिष्ठजी बोले - राजा ने उन दोनों बुद्धिमानों की बात सुनकर बार-बार विलाप करके उस कन्या को वस्त्र तथा आभूषण से अलंकृत कर मुनीन्द्र को सौंप दिया। इस प्रकार उस कन्या से विधान पूर्वक विवाह कर महर्षि पिप्पलाद महालक्ष्मी के समान उस पद्मा को लेकर प्रसन्नता से युक्त अपने घर चले गये। इधर, राजा उस वृद्ध को अपनी कन्या प्रदान करके सभी लोगों को छोड़कर मन में ग्लानि रखकर तपस्या के लिये वन में चले गये। अपने प्राणनाथ के वन चले जाने पर उनकी भार्या ने भी पति तथा कन्या के शोक से प्राण त्याग दिये।

राजा के पूज्य लोग, पुत्र, सेवक राजाके बिना मूर्च्छित हो गये तथा अन्य सभी पुरवासी एवं दूसरे लोग यह सब जानकर उच्छ्रास लेकर शोक करने लगे। राजा अनरण्य वन में जाकर कठोर तप करके भक्तिपूर्वक शंकर की आराधना कर शाश्वत शिवलोक को चला गया। तदनन्तर राजाका कीर्तिमान् नामक धार्मिक ज्येष्ठ पुत्र राज्य करने लगा और पुत्र के समान प्रजाका पालन करने लगा।

हे शैल! मैंने अनरण्य का यह शुभ चरित्र आपसे कहा, जिस प्रकार अपनी कन्या प्रदान कर उन्होंने अपने वंशकी तथा सम्पूर्ण धनकी रक्षा की। इसी प्रकार हे शैलराज! आप भी अपनी कन्या शंकरजी को देकर अपने समस्त कुल की रक्षा कीजिये और सभी देवताओं को भी वशमें कीजिये।
[शिवपुराण / रुद्र संहिता / सती खण्ड / अध्याय-३४ ]

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