आदि शंकराचार्य द्वारा रचित दशश्लोक की उत्पत्ति एक रोचक घटना है। श्री शंकराचार्य अपने गाँव कलादी में पूर्णा नदी में मगरमच्छ के जबड़ों में फँसकर मृत्यु के कगार पर थे, तब उन्होंने निर्धारित मंत्र का उच्चारण करके अनौपचारिक रूप से संन्यास ग्रहण कर लिया। तब मगरमच्छ ने तुरंत उन्हें अपने चंगुल से मुक्त कर दिया।
आदि शंकराचार्य को एक ऐसे योग्य गुरु की आवश्यकता थी, जो उन्हें संन्यास दिला सकें और उन्हें उपनिषदों का ज्ञान प्रदान कर सकें।
वे उत्तर की ओर यात्रा पर निकले और अंततः उन्हें नर्मदा नदी के तट पर एक गुफा में गहन ध्यान में लीन श्री गोविंदपादाचार्य के रूप में ऐसा गुरु प्राप्त हुआ। उन्होंने श्री शंकराचार्य से पूछा कि वे कौन हैं। इसी सरल प्रश्न के उत्तर में श्री शंकराचार्य ने दस भावपूर्ण श्लोकों व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने आत्मा के वास्तविक स्वरूप की व्याख्या की, जोकि केवल वे स्वयं ही थे।
संत को यह जानकर कि श्री शंकरा एक आत्मज्ञानी आत्मा हैं, जो संन्यास में प्रवेश करने की सामान्य विधि का पालन करने के लिए ही दीक्षा लेने उनके पास आए हैं, उन्होंने तुरंत उन्हें अपना शिष्य स्वीकार कर लिया।
न भूमिर्न तोयं न तेजो न वायुः
न खं नेन्द्रियं वा न तेषां समूहः ।
अनैकान्तिकत्वात् सुषुप्त्येकसिद्धः
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ १॥
न वर्णा न वर्णाश्रमाचारधर्मा
न मे धारणाध्यानयोगादयोऽपि ।
अनात्माश्रयाहंममाध्यासहानात्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ २॥
न माता पिता वा न देवा न लोका
न वेदा न यज्ञा न तीर्थं ब्रुवन्ति ।
सुषुप्तौ निरस्तातिशून्यात्मकत्वात्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ३॥
न सांख्यं न शैवं न तत् पाञ्चरात्रं
न जैनं न मीमांसकादेर्मतं वा ।
विशिष्टानुभूत्या विशुद्धात्मकत्वात्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ४॥
न चोर्ध्वं न चाधो न चान्तर्न बाह्यं
न मध्यं न तिर्यङ् न पूर्वापरा दिक् ।
वियद्व्यापकत्वात् अखण्डैकरूपः
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ५॥
न शुक्लं न कृष्णं न रक्तं न पीतं
न कुब्जं न पीनं न हृस्वं न दीर्घम्।
अरूपं तथा ज्योतिराकारकत्वात्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ६॥
न शास्ता न शास्त्रं न शिष्यो न शिक्षा
न च त्वं न चाहं न चायं प्रपञ्चः ।
स्वरूपावबोधो विकल्पासहिष्णुः
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ७॥
न जाग्रन्न मे स्वप्नको वा सुषुप्तिः
न विश्वो न वा तैजसः प्राज्ञको वा।
अविद्यात्मकत्वात् त्रयाणां तुरीयः
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ८॥
अपि व्यापकत्वात् हितत्त्वप्रयोगात्
स्वतः सिद्धभावादनन्याश्रयत्वात् ।
जगत् तुच्छमेतत् समस्तं तदन्यत्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ९॥
न चैकं तदन्यत द्वितीयं कुतः स्यात्
न वा केवलत्वं न चाकेवलत्वम् ।
न शून्यं न चाशून्यमद्वैतकत्वात्
कथं सर्ववेदान्तसिद्धं ब्रवीमि ॥ १०॥